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फुलंबरी- सोयगांव में बुवाई तेज

महाराष्ट्र: बारिश से फुलंबरी- सोयगांव में बुवाई तेजफुलंबरी/सोयगांव: जून के अंतिम सप्ताह तक बारिश की कमी से चिंतित फुलंबरी और सोयगांव तालुका के किसानों को अब राहत मिली है। हाल ही में हुई अच्छी बारिश के बाद दोनों तालुकों में खरीफ सीजन की बुवाई तेज़ी से शुरू हो गई है। पहले बारिश के अभाव में रुका हुआ खेती का काम अब फिर से गति पकड़ रहा है और किसान कपास, सोयाबीन तथा मक्का की बुवाई में जुट गए हैं।फुलंबरी तालुका में सूखी मिट्टी में की गई धुलपेरनी (बारिश से पहले की गई बुवाई) को समय पर हुई वर्षा से नया जीवन मिल गया है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने के कारण किसानों में दोबारा बुवाई की आशंका बढ़ गई थी। कई किसानों ने बारिश की उम्मीद में पहले ही बीज बो दिए थे, लेकिन बारिश में देरी से फसलों के खराब होने का खतरा मंडरा रहा था।शुक्रवार रात हुई अच्छी बारिश ने किसानों की चिंता काफी हद तक दूर कर दी। खेतों में नमी आने से पहले से बोई गई फसलों को संजीवनी मिली है, वहीं जिन किसानों ने अभी तक बुवाई नहीं की थी, उन्होंने भी खेतों में काम तेज़ कर दिया है। वर्तमान में दोनों तालुकों में कपास, सोयाबीन और मक्का की बुवाई जोरों पर है।हालांकि मौजूदा बारिश बुवाई के लिए पर्याप्त मानी जा रही है, लेकिन किसान लगातार और अच्छी वर्षा की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना है कि यदि आने वाले दिनों में नियमित बारिश होती रही तो कुओं, तालाबों और अन्य जल स्रोतों का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे फसलों की आगे की बढ़वार और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सकेगा।और पढ़ें :- खरीफ बुवाई 22.7% घटी

खरीफ बुवाई 22.7% घटी

साप्ताहिक मॉनसून ट्रैकर: बारिश की कमी से खरीफ बुआई 22.7% घटी, कपास-तिलहन सबसे अधिक प्रभावितदेशभर में मॉनसून की धीमी और असमान प्रगति का असर खरीफ फसलों की बुआई पर साफ दिखाई देने लगा है। बारिश की कमी और जलाशयों में घटते जलस्तर के कारण धान, कपास, तिलहन और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है। यदि जुलाई में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है।कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 25 जून 2026 तक खरीफ फसलों की बुआई 182.71 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 236.47 लाख हेक्टेयर थी। यानी कुल बुआई क्षेत्र में 53.76 लाख हेक्टेयर या 22.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी ओर, 29 जून तक देश में वर्षा की कमी 43 प्रतिशत तक पहुंच गई। देश के 48 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि 26 प्रतिशत क्षेत्र 'अत्यधिक वर्षा कमी' की श्रेणी में है।सबसे अधिक असर तिलहन फसलों पर पड़ा है। तिलहन का रकबा पिछले वर्ष के 36.40 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.98 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 19.42 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। इसमें सोयाबीन की बुआई 19.97 लाख हेक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हेक्टेयर रह गई, जबकि मूंगफली का रकबा 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर पर आ गया।कपास की बुआई भी प्रभावित हुई है। इसका रकबा 45.36 लाख हेक्टेयर से घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 15.70 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। धान का रकबा 34.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि दलहन की बुआई 21.46 लाख हेक्टेयर से घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गई। वहीं, मोटे अनाज (श्री अन्न) का रकबा भी 36.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 31.84 लाख हेक्टेयर रह गया।बारिश की कमी के साथ जलाशयों का घटता जलस्तर भी चिंता बढ़ा रहा है। देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का केवल 26.4 प्रतिशत है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 36 प्रतिशत था। दक्षिण भारत में जलाशयों का जलस्तर क्षमता के केवल 20.8 प्रतिशत पर है। कर्नाटक में यह 48.6 प्रतिशत से घटकर 14.7 प्रतिशत और तमिलनाडु में 81 प्रतिशत से घटकर 34.3 प्रतिशत रह गया है। ओडिशा के जलाशयों में भी जलस्तर केवल 15.3 प्रतिशत है।हालांकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और विदर्भ में अगले कुछ दिनों के दौरान भारी बारिश की संभावना जताई है, लेकिन यदि जुलाई में भी सामान्य से कम वर्षा रहती है, तो खरीफ उत्पादन, किसानों की आय तथा दालों, खाद्य तेलों और कपास से जुड़े बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे गिरकर 94.66 पर बंद हुआ।

पंजाब में कपास सब्सिडी बेअसर

पंजाब में कॉटन बीज पर 33% सब्सिडी का सीमित असर, किसानों का रुझान लगातार घटाचंडीगढ़: पंजाब सरकार द्वारा कॉटन बीज पर 33% सब्सिडी देने की योजना के बावजूद राज्य में किसानों का कपास की खेती से मोहभंग जारी है। कृषि विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष केवल 19,000 किसानों ने सब्सिडी योजना के तहत पंजीकरण कराया, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 52,000 थी। यानी योजना में पंजीकरण करीब 63 प्रतिशत घट गया है।सरकार ने वर्ष 2023 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (PAU) द्वारा अनुशंसित प्रमाणित बीटी कॉटन हाइब्रिड और देसी कपास की किस्मों पर 33% सब्सिडी शुरू की थी। यह सहायता प्रति किसान अधिकतम पांच एकड़ तक सीमित है। इसके बावजूद योजना के चौथे वर्ष में भी दक्षिणी मालवा क्षेत्र के किसान कपास की खेती से दूरी बनाए हुए हैं, जबकि यह क्षेत्र कभी राज्य का प्रमुख कपास उत्पादक इलाका माना जाता था।कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर (कॉटन) चरणजीत सिंह ने बताया कि इस वर्ष राज्य में लगभग 80,000 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 1.19 लाख हेक्टेयर था। उनका कहना है कि अप्रैल में बुवाई के बाद हुई बेमौसम बारिश से खेतों की सतह पर मिट्टी की सख्त परत बन गई, जिससे बीजों का अंकुरण प्रभावित हुआ और कई पौधे नष्ट हो गए। दोबारा बुवाई में अधिक खर्च आने के कारण अधिकांश किसानों ने पुनः बुवाई नहीं की।उन्होंने यह भी बताया कि नहरों में समय पर सिंचाई जल उपलब्ध नहीं होने से किसानों की मुश्किलें और बढ़ीं। सफाई कार्यों के कारण पानी की आपूर्ति में देरी हुई, जबकि बठिंडा, मानसा और श्री मुक्तसर साहिब जिलों में छोटी नहरों के क्षतिग्रस्त होने से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित रही।राज्य के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुडियन ने कहा कि विभाग देसी कपास की किस्म PBD-88 के प्रचार-प्रसार में अपेक्षित सफलता नहीं हासिल कर सका। उनके अनुसार, यह किस्म कई प्रमुख कीटों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहनशील है, कम लागत में उगाई जा सकती है और बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती है।विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में कपास की खेती को फिर से गति देने के लिए पिंक बॉलवर्म-रोधी अगली पीढ़ी की बोलगार्ड-III (Bollgard-III) जीएम कपास किस्मों की आवश्यकता होगी। फिलहाल PAU सहित कई संस्थान इसके परीक्षण कर रहे हैं और अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा परीक्षण परिणामों के मूल्यांकन के बाद लिया जाएगा।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 3 पैसे गिरकर 94.57 पर खुला.

अहमदपुर में कपास बुवाई तेज

दो दिन की बारिश से अहमदपुर में कपास की बुवाई ने पकड़ी रफ्तार, 10 हजार हेक्टेयर में होगी खेतीअहमदपुर: लंबे इंतजार के बाद पिछले दो दिनों में हुई अच्छी बारिश ने अहमदपुर तालुका के किसानों को राहत दी है। मानसून के मृग नक्षत्र का आधा समय बीत जाने के बावजूद बारिश नहीं होने से किसान चिंतित थे, लेकिन अब पर्याप्त नमी मिलने के बाद कपास की बुवाई का काम तेजी से शुरू हो गया है। सोयाबीन के बाद कपास तालुका की दूसरी सबसे प्रमुख खरीफ फसल है और इस वर्ष लगभग 10,000 हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती किए जाने का लक्ष्य है।मौसम विभाग की ओर से आगे भी बारिश की संभावना जताई गई है, जिससे किसानों ने बुवाई की गति बढ़ा दी है। शनिवार को तालुका के कई हिस्सों में मध्यम बारिश दर्ज की गई। इसके बाद शिरूर ताजबंद, अहमदपुर, नंदुरा, ढलेगांव, हाडोलती और थोडगा समेत कई गांवों में किसान खेतों में उतर गए हैं।इस खरीफ सीजन में अहमदपुर तालुका का कुल बोया जाने वाला क्षेत्र 66,587 हेक्टेयर है, जबकि कुल कृषि योग्य भूमि 71,482 हेक्टेयर है। इसमें सबसे अधिक 44,622 हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती होगी। इसके बाद 10,000 हेक्टेयर में कपास और 9,797 हेक्टेयर में अरहर (तूर) की बुवाई प्रस्तावित है।बारिश के आंकड़ों के अनुसार, 27 जून 2026 तक अहमदपुर सर्कल में 23 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जिससे कुल बारिश 112 मिमी पहुंच गई। शिरूर ताजबंद सर्कल में भी 23 मिमी बारिश हुई और कुल वर्षा 94 मिमी रही। वहीं खंडली क्षेत्र में केवल 9 मिमी (कुल 49 मिमी) और अंधोरी क्षेत्र में 7 मिमी (कुल 23 मिमी) बारिश दर्ज की गई। किंगगांव और हाडोलती सर्कल में उस दिन बारिश नहीं हुई। किंगगांव में अब तक केवल 28 मिमी वर्षा हुई है, इसलिए वहां के किसान अभी भी अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।जिन क्षेत्रों में मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं है, वहां बुवाई अभी भी रुकी हुई है। हालांकि हाडोलती क्षेत्र में लगातार दो दिन हुई बारिश के बाद किसानों ने कपास के साथ-साथ सोयाबीन की बुवाई भी शुरू कर दी है। किसानों को उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में और अच्छी बारिश होगी, जिससे बुवाई का कार्य सफलतापूर्वक पूरा हो सकेगा।हाडोलती के किसान विश्वनाथ हेंगने ने बताया, "पिछले साल जून में अच्छी बारिश हुई थी। इस बार भी अब बारिश का सिलसिला शुरू हुआ है। यदि अगले एक-दो दिनों में अच्छी वर्षा होती है तो कपास की बुवाई पूरी तरह सफल रहेगी।"तालुका कृषि अधिकारी सचिन बावगे ने किसानों को सलाह दी है कि जल्दबाजी में बुवाई न करें। उनके अनुसार, कम से कम 100 मिमी बारिश होने और मिट्टी में पर्याप्त नमी बनने के बाद ही बुवाई करना उचित है। उन्होंने कहा कि बुवाई से पहले बीजों की अंकुरण क्षमता की जांच अवश्य करें तथा बीजोपचार (सीड ट्रीटमेंट) करें। साथ ही ब्रॉड बेड फरो (BBF) या डिबलिंग पद्धति अपनाने से बीज और उर्वरक की बचत होती है तथा फसल अनियमित बारिश का बेहतर सामना कर सकती है। उन्होंने किसानों से मौसम पूर्वानुमान, कीट प्रबंधन और आधुनिक कृषि सलाह के लिए महाविस्तार AI ऐप का उपयोग करने की भी अपील की।और पढ़ें :-  चोटिला में कपास बुवाई पर संकट

चोटिला में कपास बुवाई पर संकट

बारिश की कमी से गुजरात के चोटिला में कपास की बुआई पर संकट, दोबारा बुवाई की नौबतसुरेंद्रनगर (गुजरात): गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के चोटिला पंथक में बारिश की लंबी कमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। मॉनसून की शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने उम्मीद के साथ कपास समेत खरीफ फसलों की बुआई की थी, लेकिन इसके बाद पर्याप्त वर्षा नहीं होने से कई क्षेत्रों में कपास की फसल प्रभावित होने लगी है। किसानों को आशंका है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो उन्हें दोबारा बुआई करनी पड़ सकती है।किसानों का कहना है कि शुरुआती बारिश के कारण खेतों में पर्याप्त नमी बनने से उन्होंने महंगे बीज, खाद और मजदूरी पर हजारों रुपये खर्च कर कपास की बुआई की थी। लेकिन लंबे शुष्क दौर के कारण मिट्टी की नमी तेजी से खत्म हो गई। नतीजतन, कई खेतों में कपास के बीज अंकुरित होने से पहले ही खराब हो गए या सूख गए हैं।फसल खराब होने से किसानों की लागत बढ़ गई है। कई किसान पहले ही कर्ज लेकर खेती कर रहे हैं और अब उन्हें दोबारा बीज खरीदने तथा बुआई कराने की चिंता सता रही है। इससे उनकी आर्थिक मुश्किलें और बढ़ने लगी हैं।चोटिला तालुका के पूर्व तालुका पंचायत अध्यक्ष एवं किसान नेता अंबाभाई ओलकिया ने कहा कि क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बारिश का पानी लंबे समय तक मिट्टी में नहीं टिक पाता। जल संग्रहण के सीमित साधनों की वजह से बारिश में देरी होने पर सिंचाई की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है।उन्होंने बताया कि जिन किसानों के पास बोरवेल या कुएं हैं, उन्हें भी भूजल स्तर में गिरावट और कृषि के लिए पर्याप्त बिजली आपूर्ति नहीं मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यदि आने वाले दिनों में भी बारिश नहीं हुई तो इसका असर केवल फसलों पर ही नहीं, बल्कि पशुओं के चारे और पेयजल उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।अंबाभाई ओलकिया ने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल फसल नुकसान का सर्वे कराने, किसानों को मुआवजा अथवा मुफ्त बीज और खाद उपलब्ध कराने, चेक डैम एवं जल संरक्षण परियोजनाओं में तेजी लाने और खेती के लिए नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है।फिलहाल चोटिला पंथक के किसान अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि समय पर पर्याप्त वर्षा होने पर ही सूखती फसलों को बचाया जा सकेगा और किसानों को संभावित भारी आर्थिक नुकसान से राहत मिलेगी।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 19 पैसे गिरकर 94.54 पर बंद हुआ।

PLI में निवेश बढ़ाए तमिलनाडु उद्योग

तमिलनाडु के टेक्सटाइल उद्योग से PLI योजना में निवेश की अपील, निर्यात तीन गुना बढ़ाने का लक्ष्यतिरुपुर: केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने तमिलनाडु के टेक्सटाइल और परिधान उद्योग से टेक्निकल टेक्सटाइल तथा मैन-मेड फाइबर (MMF) क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना का लाभ उठाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस योजना के तहत ₹11,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है और उद्योग को इसका उपयोग कर निवेश बढ़ाना चाहिए।तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TEA) के एक कार्यक्रम में मंत्री ने कहा कि सरकार ने टेक्निकल टेक्सटाइल और MMF क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए PLI योजना के नियमों में ढील दी है। उन्होंने बताया कि मंत्रालय की नई योजनाओं को उद्योग की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। इनमें मशीनरी, रोजगार सृजन और उत्पादन क्षमता बढ़ाने जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि राज्य और केंद्र सरकार मिलकर इस क्षेत्र के विकास को गति देंगी।गिरिराज सिंह ने उद्योग जगत से उन राज्यों में भी निवेश करने का आग्रह किया, जहां पर्याप्त श्रमबल उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में देश का वार्षिक रेशम उत्पादन 26,000 टन था, जो अब बढ़कर 43,000 टन हो गया है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक इसे 60,000 टन तक पहुंचाना है। उन्होंने रेशम और अन्य फाइबर के मिश्रण से बने वस्त्रों के निर्यात को बढ़ाने पर भी जोर दिया।कार्यक्रम में अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल ने कहा कि वस्त्र मंत्रालय लगातार नई योजनाएं लागू कर रहा है और सभी सात PM MITRA पार्क अब संचालित हो चुके हैं। वहीं, TEA के अध्यक्ष के.एम. सुब्रमण्यन ने टेक्सटाइल एक्सपेंशन एंड एम्प्लॉयमेंट मिशन (TEEM) को जल्द लागू करने तथा कर और लेवी से जुड़ी राहत को तीन वर्ष और बढ़ाने की मांग की।बाद में केंद्रीय मंत्री ने कोयंबटूर स्थित साउथ इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (SITRA) में कपास और कपास आधारित उत्पादों के लिए स्थापित GM टेस्टिंग लैब का उद्घाटन किया। हाल ही में NABL से मान्यता प्राप्त इस लैब से वैश्विक कपास व्यापार में गुणवत्ता जांच, ट्रेसेबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुपालन को मजबूती मिलेगी। उन्होंने तमिलनाडु के टेक्सटाइल उद्योग से राज्य के वस्त्र निर्यात को तीन गुना बढ़ाने और निटिंग, वीविंग तथा प्रोसेसिंग क्षेत्रों के लिए स्वदेशी मशीनरी निर्माण में निवेश बढ़ाने का भी आह्वान किया।और पढ़ें :- अहिल्यानगर में कपास बुवाई शुरू

अहिल्यानगर में कपास बुवाई शुरू

महाराष्ट्र: कम बारिश के बीच शुरू हुई कपास की बुवाई, अहिल्यानगर में रकबा घटने की आशंकामहाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में मॉनसून की शुरुआत हुए लगभग एक महीना बीत चुका है, लेकिन अब तक सामान्य और व्यापक बारिश नहीं होने से खरीफ सीजन की बुवाई प्रभावित हो रही है। हालांकि पिछले दो दिनों में हुई हल्की बारिश के बाद कुछ किसानों ने सिंचाई सुविधाओं के भरोसे कपास की बुवाई शुरू कर दी है। कृषि विभाग का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो इस वर्ष जिले में कपास का कुल रकबा घट सकता है।जिले के शेवगांव, पाथर्डी, राहुरी और नेवासा जैसे तालुकों में सीमित स्तर पर कपास की बुवाई शुरू हो चुकी है। लेकिन अधिकांश किसान अभी भी पर्याप्त वर्षा का इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि कम नमी वाली जमीन में बुवाई करने पर बीज खराब होने और दोबारा बुवाई की नौबत आने का खतरा रहता है। चूंकि कपास के बीज महंगे हैं, इसलिए दोबारा बुवाई किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकती है।पिछले कुछ वर्षों में अहिल्यानगर जिले में कपास की खेती का रकबा लगातार बढ़ा है। पहले जहां जिले में कपास सीमित क्षेत्र में बोई जाती थी, वहीं अब गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के किसान भी कपास की खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। वर्तमान में अहिल्यानगर, शेवगांव, पाथर्डी, नेवासा, जामखेड़, कर्जत और कोपरगांव सहित कई क्षेत्रों में कपास की खेती की जा रही है। पिछले तीन वर्षों में जिले में कपास का औसत रकबा 1,22,086 हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जबकि पिछले वर्ष लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती हुई थी।अब तक राहुरी तालुका में सबसे अधिक 5,045 हेक्टेयर में कपास की बुवाई दर्ज की गई है। इसके बाद नेवासा में 1,551 हेक्टेयर, श्रीगोंडा में 571 हेक्टेयर, कर्जत में 318 हेक्टेयर, शेवगांव में 300 हेक्टेयर तथा श्रीरामपुर में 238 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई की गई है।कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्यतः मृग नक्षत्र के दौरान अच्छी बारिश होने पर कपास की बुवाई रफ्तार पकड़ती है, लेकिन इस वर्ष मानसून की धीमी प्रगति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले दो वर्षों में अत्यधिक बारिश से फसल को नुकसान और बाजार में उचित दाम नहीं मिलने के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में इस वर्ष किसानों को समय पर अच्छी बारिश और कपास के बेहतर बाजार भाव, दोनों का इंतजार है। यदि जल्द पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो जिले में कपास की खेती का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम रह सकता है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 5 पैसे मजबूत होकर 94.35 पर खुला

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रुपया 94.66 प्रति डॉलर पर स्थिर खुला. 01-07-2026 09:50:48 view
फुलंबरी- सोयगांव में बुवाई तेज 30-06-2026 16:15:14 view
खरीफ बुवाई 22.7% घटी 30-06-2026 16:07:48 view
डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे गिरकर 94.66 पर बंद हुआ। 30-06-2026 15:45:37 view
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डॉलर के मुकाबले रुपया 3 पैसे गिरकर 94.57 पर खुला. 30-06-2026 09:24:44 view
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