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अमरावती कपास में गुलाबी सुंडी

मॉनसून से पहले बोई कपास में गुलाबी सुंडी का प्रकोप, किसानों की बढ़ी चिंताअमरावती, महाराष्ट्र: अमरावती क्षेत्र में मॉनसून से पहले बोई गई कपास की फसल में पिंक बॉलवर्म यानी गुलाबी सुंडी मिलने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। वालनी खुर्द और वालनी बुद्रुक के कुछ खेतों में कपास के बॉल के अंदर गुलाबी सुंडी के लार्वा पाए गए हैं। किसानों को आशंका है कि आने वाले दिनों में इसका असर दूसरे खेतों तक भी पहुंच सकता है।पाथरोट के किसान नरेश सुइगोट ने सिंचाई की सुविधा का उपयोग करते हुए मई के आखिरी सप्ताह में वालनी बुद्रुक में कपास की बुवाई की थी। किसान के अनुसार, उनकी फसल अब तक अच्छी स्थिति में थी और पौधों पर 70 से अधिक बॉल लगे हुए थे। इससे उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद थी।हालांकि, फसल की जांच के दौरान कुछ कपास के बॉल में छेद दिखाई दिए। बॉल खोलने पर अंदर गुलाबी सुंडी के लार्वा मिले। इसके बाद क्षेत्र के किसानों की चिंता बढ़ गई है।क्षेत्र में बारिश की कमी के कारण कपास की फसल पहले से ही पानी की कमी का सामना कर रही है। ऐसे में यदि गुलाबी सुंडी का प्रकोप बढ़ता है, तो इससे कपास की पैदावार प्रभावित हो सकती है।कपास को कैसे नुकसान पहुंचाती है गुलाबी सुंडी?गुलाबी सुंडी कपास के बॉल के अंदर प्रवेश करके बीज और रेशे को नुकसान पहुंचा सकती है। शुरुआती अवस्था में बाहर से इसकी पहचान करना मुश्किल होता है। बाद में संक्रमित बॉल में छेद दिखाई दे सकते हैं।कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, समय से पहले कपास की बुवाई करने से गुलाबी सुंडी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि, इस मामले में प्रकोप का निश्चित कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।किसानों को सलाह दी गई है कि वे खेतों की नियमित निगरानी करें। कपास के बॉल में छेद या सुंडी के लक्षण दिखाई देने पर कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञों से समय पर सलाह लें। साथ ही, कपास की बुवाई और बीज खरीद से जुड़े सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करें।और पढ़ें :- विरुधुनगर कपास किसानों को सब्सिडी

विरुधुनगर कपास किसानों को सब्सिडी

विरुधुनगर में कपास किसानों को मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी के तहत सब्सिडीविरुधुनगर, तमिलनाडु: कपास किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने और उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने के लिए विरुधुनगर जिले में ‘मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी’ के तहत विभिन्न गतिविधियों पर सब्सिडी दी जाएगी। योजना में प्रदर्शन प्लॉट, ड्रोन से फसल सुरक्षा रसायनों का छिड़काव और किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण देने का प्रावधान है।जिला कलेक्टर शरण्या एरी ने बताया कि मिशन का उद्देश्य कपास की खेती का रकबा बढ़ाना, फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करना तथा किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक से जोड़ना है। वित्त वर्ष 2026-27 में किसानों की आय बढ़ाने पर भी जोर दिया जाएगा।योजना के तहत हाई-डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS) के प्रदर्शन प्लॉट के लिए किसानों को ₹14,000 की सब्सिडी दी जाएगी। वहीं, पास-पास पौधे लगाने वाले प्रदर्शन प्लॉट के लिए ₹18,500 की सहायता का प्रावधान है। एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास की खेती के प्रदर्शन प्लॉट के लिए किसानों को ₹9,500 की सब्सिडी मिलेगी।कपास के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के लिए इंटीग्रेटेड क्रॉप मैनेजमेंट (ICM) के प्रदर्शन प्लॉट पर ₹7,500 की सब्सिडी दी जाएगी।इसके अलावा, ड्रोन के माध्यम से फसल सुरक्षा रसायनों का छिड़काव कराने वाले किसानों को इस कार्य की लागत का 50 प्रतिशत हिस्सा सब्सिडी के रूप में दिया जाएगा। किसानों को कपास की खेती में आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।योजना के तहत विभिन्न प्रदर्शन प्लॉट के लिए कुल 1,600 हेक्टेयर क्षेत्र और ड्रोन से फसल सुरक्षा रसायनों के छिड़काव के लिए 800 हेक्टेयर क्षेत्र निर्धारित किया गया है।इच्छुक किसान ‘उझावन’ (Uzhavan) ऐप के माध्यम से या नजदीकी सहायक निदेशक (कृषि) कार्यालय में संपर्क कर पंजीकरण करा सकते हैं।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 7 पैसे गिरकर 96.05 पर खुला

मौसम से जलगांव की कपास फसल प्रभावित

जलगांव में कपास की फसल पर मौसम की मार, दिवाली से पहले सीजन खत्म होने की संभावनाजलगांव, महाराष्ट्र: इस साल खरीफ सीजन की शुरुआत से ही मौसम में बदलाव और बारिश की अनिश्चितता के कारण कपास किसानों की परेशानी बढ़ी है। जून-जुलाई में हुई तेज बारिश से कुछ क्षेत्रों में कपास की बढ़वार प्रभावित हुई, जबकि जुलाई के आखिर तक मानसूनी कपास की बुआई भी प्रभावित रही। इसके बाद श्रावण महीने में पर्याप्त बारिश नहीं होने से कई इलाकों में फसलों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा।किसानों के अनुसार, गर्मी के कपास की फसल में रॉट और ब्लैक रॉट जैसी बीमारियों का असर देखा गया। फसल को बचाने के लिए कीटनाशक और अन्य कृषि दवाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। कई किसानों ने मई में कुओं के पानी के भरोसे ड्रिप सिंचाई के माध्यम से गर्मी के कपास की बुआई की थी। हालांकि, बाद में कुओं का जलस्तर कम होने से फसल की बढ़वार प्रभावित हुई।फसल में डोडों की संख्या कम रहने के कारण गर्मी के कपास से प्रति एकड़ करीब 3 से 4 क्विंटल उत्पादन का अनुमान जताया जा रहा है। मानसूनी कपास की फसल भी कई क्षेत्रों में प्रभावित होने की बात सामने आई है। बारिश की कमी और वापसी की बारिश नहीं होने से खेतों की नमी तथा कुओं के जलस्तर पर असर पड़ा है।प्रति एकड़ ₹40 से ₹45 हजार तक खर्चकिसानों के अनुसार, कपास की खेती में प्रति एकड़ करीब ₹40,000 से ₹45,000 तक खर्च हो रहा है। इसमें खाद, बीज, मजदूरी, निराई-गुड़ाई, कीटनाशक, कटाई और अन्य कृषि कार्यों का खर्च शामिल है। बीमारी और फसल बचाने के लिए अतिरिक्त दवाओं के इस्तेमाल से लागत बढ़ने की भी बात कही गई है।रबी सीजन को लेकर भी चिंताकिसानों के अनुसार, इस बार कुछ क्षेत्रों में कपास का सीजन सामान्य अवधि से पहले, यानी दिवाली से पहले समाप्त होने की संभावना है। हालांकि, यह स्थिति क्षेत्र और फसल की अवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।बारिश और सिंचाई के पानी की कमी के कारण किसानों को रबी सीजन के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी और पानी उपलब्ध रहने को लेकर भी चिंता है। आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति, कुओं का जलस्तर और फसल की वास्तविक उपज से स्थिति और स्पष्ट होगी।

उनावा APMC में कपास आवक शुरू

उनावा APMC में कपास की आवक शुरू, ₹2,525 प्रति मन तक पहुंचा भावमेहसाणा, गुजरात: गुजरात के मेहसाणा जिले के उंझा तालुका स्थित उनावा APMC में नए कपास की आवक शुरू हो गई है। शुरुआती कारोबार में अब तक करीब 100 मन कपास की आवक दर्ज की गई है। मंडी में कपास के भाव ₹1,500 से लेकर ₹2,525 प्रति मन तक रहे। ₹2,525 प्रति मन शुरुआती दौर में दर्ज किया गया अधिकतम भाव है। फिलहाल कपास की आवक मुख्य रूप से मेहसाणा और पाटन जिलों से हो रही है।APMC सेक्रेटरी राजूभाई पटेल के अनुसार, मंडी में किसानों की सुविधा के लिए सही वजन, नकद भुगतान, पीने के पानी और पार्किंग जैसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। कपास का मंडी सीजन आमतौर पर सितंबर से अप्रैल तक चलता है। अक्टूबर से दिसंबर के दौरान कपास की आवक अधिक रहने की संभावना रहती है।मंडी से जुड़े लोगों के अनुसार, इस साल पिछले साल की तुलना में कपास की आवक अधिक रहने की उम्मीद है। हालांकि, अभी सीजन की शुरुआत है और केवल 100 मन की आवक दर्ज हुई है, इसलिए पूरे सीजन की कुल आवक का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगा। आगे की आवक पर मौसम, उत्पादन और किसानों के बिक्री निर्णय का असर रहेगा।कपास की कीमतों में आगे तेजी की संभावना भी जताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कम बारिश, कपास की बुआई में कमी और विदेशों से मांग जैसे कारक बाजार को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, आने वाले समय में वास्तविक भाव मंडी आवक, कपास की गुणवत्ता, उत्पादन तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मांग के आधार पर तय होंगे।कपास का उपयोग मुख्य रूप से कपड़ा और धागा बनाने में किया जाता है। इसके अलावा कपास के बीज से कॉटनसीड ऑयल सहित अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। आने वाले दिनों में आवक बढ़ने के साथ उनावा APMC में कपास के भाव और बाजार की स्थिति पर किसानों और व्यापारियों की नजर रहेगी।और पढ़ें :- गडकरी जी भारत को कपास निर्यातक के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं।

गडकरी जी भारत को कपास निर्यातक के तौर पर आगे बढ़ा रहे हैं।

भारत को कॉटन इम्पोर्टर नहीं, एक्सपोर्टर बनाना होगा: गडकरी जी ने टेक्नोलॉजी और क्वालिटी पर दिया जोरऑल इंडिया कॉटन समिट 2026 में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी जी  ने देशभर से आए जिनर्स, ट्रेडर्स, मिलर्स, ब्रोकर्स और एक्सपोर्टर्स को संबोधित करते हुए कहा कि कॉटन भारतीय अर्थव्यवस्था और किसानों के लिए महत्वपूर्ण कैश क्रॉप है। उन्होंने कहा कि प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ाना और उत्पादन लागत कम करना कॉटन सेक्टर की प्रमुख प्राथमिकता होनी चाहिए।गडकरी जी ने कॉटन उद्योग से जुड़े लोगों से किसानों को बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक खेती के लिए मार्गदर्शन देने की अपील की। उन्होंने कहा कि बेहतर सीड, आधुनिक जिनिंग-प्रेसिंग और अच्छी गुणवत्ता के उत्पादन से भारतीय कॉटन की एक्सपोर्ट क्षमता बढ़ेगी और इसका लाभ किसान, जिनर, ट्रेडर और पूरी टेक्सटाइल इंडस्ट्री को मिलेगा।उन्होंने कहा कि भारत में कॉटन की उत्पादकता अभी भी कम है और डेंसिटी के साथ प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। आने वाले समय में AI, सैटेलाइट और ड्रोन जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाना होगा। उन्होंने बताया कि AI और सैटेलाइट तकनीक से मौसम, बीमारी और खाद की जरूरत जैसी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कॉटन क्षेत्रों में किसान वर्कशॉप आयोजित कर उन्हें नई तकनीकों के प्रति जागरूक करने की अपील की।कॉटन की गुणवत्ता पर जोर देते हुए गडकरी जी ने कहा कि अलग-अलग गुणवत्ता की कपास को मिक्स करने के बजाय उसकी गुणवत्ता के अनुसार अलग-अलग बैल तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि ईमानदारी, पारदर्शिता, विश्वसनीयता और गुडविल 21वीं सदी की सबसे बड़ी पूंजी हैं। अल्पकालिक लाभ के लिए गुणवत्ता से समझौता करने से भारतीय कॉटन की ब्रांड वैल्यू और एक्सपोर्ट प्रभावित हो सकता है।उन्होंने देश में करीब 290 लाख टन कॉटन उत्पादन के मुकाबले लगभग 340 लाख टन खपत और करीब 50 लाख टन के अंतर का उल्लेख किया। 2025-26 में करीब 60 लाख टन कॉटन इम्पोर्ट का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत को आयात घटाकर एक्सपोर्ट बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।गडकरी जी ने कृषि में ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया। उन्होंने नैनो यूरिया एवं नैनो उर्वरकों के ड्रोन स्प्रे का उदाहरण देते हुए कहा कि इससे इनपुट का अधिक प्रभावी उपयोग संभव है। उन्होंने कृषि उपकरणों को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक और सोलर ऊर्जा की ओर ले जाने की आवश्यकता भी बताई।उन्होंने लॉजिस्टिक लागत कम करने को एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा के लिए महत्वपूर्ण बताया। विदर्भ से बांग्लादेश तक कॉटन परिवहन में नागपुर-हल्दिया और रिवर रूट के उपयोग से परिवहन समय करीब 27 दिन से घटकर 15 दिन और लागत में लगभग 10% तक कमी आने की संभावना उन्होंने बताई।गडकरी जी ने इजराइल में प्रति एकड़ अधिक कॉटन उत्पादकता का उदाहरण देते हुए भारत में उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने भारत सरकार के कॉटन मिशन, बेहतर बीज और टेक्नोलॉजी के माध्यम से किसानों की आय एवं उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र की टेक्सटाइल योजनाओं की सराहना करते हुए संबंधित इंसेंटिव समय पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 10 पैसे गिरकर 95.98 पर बंद हुआ।

गिरिराज सिंह जी ने 35% लिंट रिकवरी पर जोर दिया

कपास सेक्टर में बड़ा बदलाव! गिरिराज सिंह जी ने जिनर्स से 35%+ लिंट रिकवरी पर दिया जोरऑल इंडिया कॉटन समिट 2026 में केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह जी ने देशभर से आए जिनर्स, ट्रेडर्स, मिलर्स, ब्रोकर्स और एक्सपोर्टर्स को संबोधित करते हुए कहा कि किसानों के बिना जिनिंग, मिलिंग और वीविंग सहित पूरी कॉटन वैल्यू चेन आगे नहीं बढ़ सकती।उन्होंने उद्योग से किसानों को सहयोग देने और आधुनिक तकनीक अपनाने का आग्रह किया।गिरिराज सिंह जी ने कहा कि कॉटन इंडस्ट्री तेजी से आधुनिक मशीनरी और नई तकनीकों की ओर बढ़ रही है। ऐसे में जिनर्स को भी समय के साथ अपनी मशीनरी और तकनीक को अपडेट करना होगा। उन्होंने कहा कि आज भी कई जिनिंग इकाइयां पुरानी तकनीक से काम कर रही हैं, जिसके कारण कपास से केवल 32–33% लिंट ही प्राप्त हो रहा है। भारत दुनिया के प्रमुख कपास उत्पादक देशों में शामिल है, फिर भी कई बार घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए कपास आयात करना पड़ता है। ऐसे में लिंट रिकवरी और गुणवत्ता बढ़ाना जरूरी है।मंत्री जी ने मिट्टी की गुणवत्ता पर भी जोर देते हुए कहा कि कई खेतों में कार्बन की मात्रा 0.3–0.6% से अधिक नहीं है। उन्होंने कहा कि खेत में पर्याप्त कार्बन नहीं होने से मिट्टी की गुणवत्ता और उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए बेहतर कृषि पद्धतियां अपनाने की जरूरत है।CCI को सुझाव देते हुए गिरिराज सिंह ने कहा कि 35% से अधिक लिंट रिकवरी देने वाले जिनर्स के बीच प्रतिस्पर्धा कराकर उन्हें प्रोत्साहन देने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं, 33% से कम लिंट रिकवरी देने वाली इकाइयों की समीक्षा की जानी चाहिए। उन्होंने सभी जिनर्स से आधुनिक तकनीक अपनाकर 35% से अधिक लिंट रिकवरी हासिल करने का प्रयास करने को कहा।उन्होंने बताया कि Cotton App के माध्यम से कपास खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ी है और 42 लाख से अधिक किसान इससे जुड़ चुके हैं। कई राज्यों ने अपनी किसान हितैषी योजनाओं को CCI App से जोड़ने का भी प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि किसान मजबूत होंगे तभी पूरे कॉटन सेक्टर का सतत विकास संभव होगा।और पढ़ें :- CCI कपास भाव ₹1,400 तक घटे, बिक्री 94.40 लाख गांठ

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