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आदिलाबाद में खरीफ बुवाई तेज

अच्छी बारिश से आदिलाबाद में खरीफ फसलों को मिली नई उम्मीद, किसानों ने तेज की बुवाईआदिलाबाद: जून के आखिरी सप्ताह में हुई अच्छी बारिश ने आदिलाबाद क्षेत्र के किसानों के चेहरों पर फिर से मुस्कान लौटा दी है। लंबे समय तक बारिश की कमी से चिंतित किसान अब खरीफ सीजन को लेकर आशावान हैं। लगातार हुई वर्षा से खेतों में पर्याप्त नमी आ गई है, जिससे कपास, अरहर और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई तेज हो गई है।इस वर्ष जून के शुरुआती तीन सप्ताह तक आदिलाबाद, कोमाराम भीम आसिफाबाद, निर्मल और मंचरियल जिलों में सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई थी। विशेष रूप से मंचरियल जिले में 19 जून तक भारी वर्षा की कमी बनी हुई थी। हालांकि, जून के अंतिम सप्ताह में हुई व्यापक बारिश ने हालात में उल्लेखनीय सुधार किया और अधिकांश जिलों में वर्षा की स्थिति सामान्य श्रेणी में पहुंच गई।1 जुलाई तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, निर्मल जिले में सामान्य 178.2 मिमी के मुकाबले 170.2 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जिससे केवल 4 प्रतिशत की कमी रही। कोमाराम भीम आसिफाबाद जिले में सामान्य 195.5 मिमी के मुकाबले 169.2 मिमी वर्षा हुई और यहां 13 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। मंचरियल जिले में सामान्य 168.0 मिमी के मुकाबले 140.3 मिमी बारिश हुई, जिससे वर्षा की कमी घटकर 16 प्रतिशत रह गई। वहीं, आदिलाबाद जिले में सामान्य 216.7 मिमी के मुकाबले 166.0 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जिसके कारण यहां अभी भी 23 प्रतिशत वर्षा की कमी बनी हुई है।कृषि अधिकारियों का कहना है कि जून के अंतिम सप्ताह में हुई बारिश ने खरीफ सीजन के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर दिया है। जिन किसानों की शुरुआती बुवाई कम बारिश के कारण सफल नहीं हो पाई थी, वे अब दोबारा बीज बो रहे हैं। पर्याप्त नमी मिलने से बीजों के बेहतर अंकुरण और अच्छी फसल की उम्मीद बढ़ गई है।आदिलाबाद ग्रामीण मंडल के टंतोली गांव के किसान राजेश्वर ने बताया कि जून के तीसरे सप्ताह तक कम बारिश के कारण किसानों में निराशा थी और उन्हें खरीफ सीजन प्रभावित होने की आशंका सताने लगी थी। लेकिन अंतिम सप्ताह में हुई जोरदार बारिश ने पूरी तस्वीर बदल दी। उन्होंने कहा कि किसान अब पूरी मेहनत के साथ बुवाई में जुटे हैं और उन्हें उम्मीद है कि मौसम का साथ मिलने पर इस बार खरीफ की फसल अच्छी होगी।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 32 पैसे मजबूत होकर 94.92 पर खुला.

ब्राजील का कपास निर्यात रिकॉर्ड पर

ब्राज़ील की कपास फसल इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी, रिकॉर्ड निर्यात से वैश्विक बाज़ार में बढ़ी पकड़ब्राज़ील वैश्विक कपास व्यापार में अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रहा है। राबोबैंक की जून 2026 एग्रो-इन्फो रिपोर्ट के अनुसार, देश का 2025/26 कपास उत्पादन लगभग 40 लाख टन लिंट (रुई) रहने का अनुमान है, जो उसके इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादन होगा। बेहतर पैदावार और मजबूत निर्यात प्रदर्शन ने ब्राज़ील को दुनिया के प्रमुख कपास निर्यातकों में और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है।रिपोर्ट के मुताबिक, इस सीज़न में कपास का रकबा करीब 2% घटा, लेकिन पूरे फसल चक्र के दौरान अनुकूल मौसम के कारण पैदावार बेहतर रही। इससे उत्पादन पर रकबे में आई कमी का असर नहीं पड़ा और कुल उत्पादन मजबूत बना रहा।अगस्त 2025 से मई 2026 के बीच ब्राज़ील ने लगभग 30 लाख टन लिंट का निर्यात किया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 17% अधिक है। दूसरी तिमाही में तेज़ निर्यात ने वैश्विक बाज़ार में ब्राज़ील की हिस्सेदारी और मजबूत की है।हालांकि उत्पादन और निर्यात के मोर्चे पर तस्वीर सकारात्मक है, लेकिन वैश्विक कपास बाज़ार अभी भी चुनौतियों से घिरा हुआ है। राबोबैंक द्वारा उद्धृत USDA के अनुमान के अनुसार, 2026/27 में वैश्विक कपास उत्पादन में लगभग 5% की गिरावट आ सकती है, जबकि खपत में केवल 1.5% की बढ़ोतरी का अनुमान है। इससे वैश्विक भंडार घटेगा, लेकिन कीमतों में तेज़ उछाल की संभावना सीमित रहेगी।बैंक का कहना है कि महंगाई, कमजोर उपभोक्ता मांग, बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत और अमेरिका, इज़राइल तथा ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक फाइबर बाज़ार पर दबाव बनाए हुए हैं। इसके अलावा, अल नीनो से जुड़े संभावित मौसमीय जोखिम भी अगले सीज़न में आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।घरेलू बाज़ार में भी कपास की बिक्री मजबूत बनी हुई है। IMEA के अनुसार, माटो ग्रोसो में अनुमानित उत्पादन का 72% पहले ही बिक चुका है, जो पांच साल के औसत से अधिक है। राबोबैंक का मानना है कि बेहतर उत्पादकता, मजबूत निर्यात और प्रतिस्पर्धी कीमतों के दम पर ब्राज़ील आने वाले समय में भी वैश्विक कपास व्यापार का प्रमुख खिलाड़ी बना रहेगा।और पढ़ें :- आयातित कपास में लागत लाभ नहीं

आयातित कपास में लागत लाभ नहीं

ड्यूटी हटने के बाद भी आयातित कपास पर नहीं मिला खास लागत लाभ: CAIनई दिल्ली। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के ताजा बाजार आंकड़ों के अनुसार, भारत में कपास के आयात पर लगने वाली 11 प्रतिशत सीमा शुल्क (इंपोर्ट ड्यूटी) को अस्थायी रूप से हटाने के बावजूद आयातित कपास, घरेलू कपास की तुलना में उल्लेखनीय रूप से सस्ती नहीं हुई है।CAI के मुताबिक, भारतीय और वैश्विक बाजार में कपास की कीमतें लगभग समान स्तर पर बनी हुई हैं। ऐसे में टेक्सटाइल मिलों के लिए आयात का फैसला केवल कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि फाइबर की गुणवत्ता, उपलब्धता और समय पर आपूर्ति जैसे कारकों पर निर्भर रहेगा।26 जून को समाप्त सप्ताह के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय कपास की औसत कीमत C&F फ़ार ईस्ट आधार पर 79.50 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड रही, जिसमें 6.00 सेंट प्रति पाउंड का फ्रेट शामिल है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क Cotlook A Index की औसत कीमत 80.00 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड दर्ज की गई।इस प्रकार भारतीय कपास की कीमत केवल 0.50 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड या करीब 400 रुपये प्रति कैंडी (लगभग 0.63 प्रतिशत) कम रही। CAI का कहना है कि यह मामूली अंतर इंश्योरेंस, पोर्ट हैंडलिंग, इनलैंड लॉजिस्टिक्स और अन्य अतिरिक्त खर्चों के कारण आसानी से समाप्त हो जाता है। इसलिए विदेशी कपास के आयात से टेक्सटाइल मिलों को कोई खास लागत लाभ मिलने की संभावना नहीं है।गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने के उद्देश्य से 1 जून से 30 अक्टूबर 2026 तक कपास आयात पर लगने वाली 11 प्रतिशत ड्यूटी को निलंबित किया है। हालांकि, ताजा बाजार विश्लेषण से संकेत मिलता है कि इस नीति का आयातित कपास की वास्तविक लागत पर सीमित प्रभाव पड़ा है।CAI ने स्पष्ट किया कि ड्यूटी हटने के बावजूद आयातकों को फ्रेट, इंश्योरेंस, पोर्ट हैंडलिंग, देश के भीतर परिवहन, वित्तपोषण और विनिमय दर से जुड़े खर्च वहन करने पड़ते हैं। ये अतिरिक्त लागतें घरेलू और आयातित कपास के बीच मौजूद मामूली मूल्य अंतर को पूरी तरह समाप्त कर देती हैं।एसोसिएशन ने यह भी बताया कि इसी सप्ताह भारतीय कपास का कारोबार ICE दिसंबर 2026 कॉटन फ्यूचर्स के मुकाबले 8.20 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड के प्रीमियम पर हुआ। हालांकि, यह अंतर भारत के स्पॉट बाजार और फॉरवर्ड फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के बीच का है और इसका आयातित कपास की प्रतिस्पर्धात्मकता से सीधा संबंध नहीं है।और पढ़ें :- सूरजगढ़ में कपास फसल सर्वे

सूरजगढ़ में कपास फसल सर्वे

कृषि विभाग ने कपास की फसलों का किया सर्वे, किसानों को बांटा ट्राइकोडर्मासूरजगढ़। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत संचालित लोकस्ट एंड इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट सेंटर, जयपुर की पहल पर मंगलवार को कृषि विभाग की टीम ने क्षेत्र के विभिन्न गांवों में कपास की फसलों का सर्वे किया। इस दौरान किसानों को जैविक फफूंदनाशी ट्राइकोडर्मा का वितरण भी किया गया।सर्वे के दौरान अधिकारियों ने बताया कि फिलहाल कपास की फसलों में कीटों का प्रकोप इकोनॉमिक थ्रेशोल्ड लेवल (ETL) से कम है। इसके बावजूद किसानों को नियमित रूप से फसल की निगरानी करने और कीटों का प्रकोप बढ़ने पर केवल CIB&RC द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का ही उपयोग करने की सलाह दी गई।टीम ने किसानों को रस चूसने वाले कीटों की रोकथाम के लिए नीले और पीले स्टिकी कार्ड तथा पिंक बॉलवर्म के नियंत्रण हेतु फेरोमोन ट्रैप के उपयोग की जानकारी भी दी। साथ ही, जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किसानों को ट्राइकोडर्मा उपलब्ध कराया गया।और पढ़ें :- रुपया 94.66 प्रति डॉलर पर स्थिर खुला.

फुलंबरी- सोयगांव में बुवाई तेज

महाराष्ट्र: बारिश से फुलंबरी- सोयगांव में बुवाई तेजफुलंबरी/सोयगांव: जून के अंतिम सप्ताह तक बारिश की कमी से चिंतित फुलंबरी और सोयगांव तालुका के किसानों को अब राहत मिली है। हाल ही में हुई अच्छी बारिश के बाद दोनों तालुकों में खरीफ सीजन की बुवाई तेज़ी से शुरू हो गई है। पहले बारिश के अभाव में रुका हुआ खेती का काम अब फिर से गति पकड़ रहा है और किसान कपास, सोयाबीन तथा मक्का की बुवाई में जुट गए हैं।फुलंबरी तालुका में सूखी मिट्टी में की गई धुलपेरनी (बारिश से पहले की गई बुवाई) को समय पर हुई वर्षा से नया जीवन मिल गया है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने के कारण किसानों में दोबारा बुवाई की आशंका बढ़ गई थी। कई किसानों ने बारिश की उम्मीद में पहले ही बीज बो दिए थे, लेकिन बारिश में देरी से फसलों के खराब होने का खतरा मंडरा रहा था।शुक्रवार रात हुई अच्छी बारिश ने किसानों की चिंता काफी हद तक दूर कर दी। खेतों में नमी आने से पहले से बोई गई फसलों को संजीवनी मिली है, वहीं जिन किसानों ने अभी तक बुवाई नहीं की थी, उन्होंने भी खेतों में काम तेज़ कर दिया है। वर्तमान में दोनों तालुकों में कपास, सोयाबीन और मक्का की बुवाई जोरों पर है।हालांकि मौजूदा बारिश बुवाई के लिए पर्याप्त मानी जा रही है, लेकिन किसान लगातार और अच्छी वर्षा की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनका कहना है कि यदि आने वाले दिनों में नियमित बारिश होती रही तो कुओं, तालाबों और अन्य जल स्रोतों का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे फसलों की आगे की बढ़वार और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो सकेगा।और पढ़ें :- खरीफ बुवाई 22.7% घटी

खरीफ बुवाई 22.7% घटी

साप्ताहिक मॉनसून ट्रैकर: बारिश की कमी से खरीफ बुआई 22.7% घटी, कपास-तिलहन सबसे अधिक प्रभावितदेशभर में मॉनसून की धीमी और असमान प्रगति का असर खरीफ फसलों की बुआई पर साफ दिखाई देने लगा है। बारिश की कमी और जलाशयों में घटते जलस्तर के कारण धान, कपास, तिलहन और दलहन जैसी प्रमुख फसलों की बुआई पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है। यदि जुलाई में भी पर्याप्त बारिश नहीं होती है, तो कृषि उत्पादन और खाद्य महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका है।कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 25 जून 2026 तक खरीफ फसलों की बुआई 182.71 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 236.47 लाख हेक्टेयर थी। यानी कुल बुआई क्षेत्र में 53.76 लाख हेक्टेयर या 22.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। दूसरी ओर, 29 जून तक देश में वर्षा की कमी 43 प्रतिशत तक पहुंच गई। देश के 48 प्रतिशत हिस्से में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि 26 प्रतिशत क्षेत्र 'अत्यधिक वर्षा कमी' की श्रेणी में है।सबसे अधिक असर तिलहन फसलों पर पड़ा है। तिलहन का रकबा पिछले वर्ष के 36.40 लाख हेक्टेयर से घटकर 16.98 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 19.42 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। इसमें सोयाबीन की बुआई 19.97 लाख हेक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हेक्टेयर रह गई, जबकि मूंगफली का रकबा 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर पर आ गया।कपास की बुआई भी प्रभावित हुई है। इसका रकबा 45.36 लाख हेक्टेयर से घटकर 29.66 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 15.70 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। धान का रकबा 34.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 25.75 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि दलहन की बुआई 21.46 लाख हेक्टेयर से घटकर 14.92 लाख हेक्टेयर रह गई। वहीं, मोटे अनाज (श्री अन्न) का रकबा भी 36.07 लाख हेक्टेयर से घटकर 31.84 लाख हेक्टेयर रह गया।बारिश की कमी के साथ जलाशयों का घटता जलस्तर भी चिंता बढ़ा रहा है। देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का केवल 26.4 प्रतिशत है, जबकि पिछले वर्ष इसी समय यह 36 प्रतिशत था। दक्षिण भारत में जलाशयों का जलस्तर क्षमता के केवल 20.8 प्रतिशत पर है। कर्नाटक में यह 48.6 प्रतिशत से घटकर 14.7 प्रतिशत और तमिलनाडु में 81 प्रतिशत से घटकर 34.3 प्रतिशत रह गया है। ओडिशा के जलाशयों में भी जलस्तर केवल 15.3 प्रतिशत है।हालांकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और विदर्भ में अगले कुछ दिनों के दौरान भारी बारिश की संभावना जताई है, लेकिन यदि जुलाई में भी सामान्य से कम वर्षा रहती है, तो खरीफ उत्पादन, किसानों की आय तथा दालों, खाद्य तेलों और कपास से जुड़े बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे गिरकर 94.66 पर बंद हुआ।

पंजाब में कपास सब्सिडी बेअसर

पंजाब में कॉटन बीज पर 33% सब्सिडी का सीमित असर, किसानों का रुझान लगातार घटाचंडीगढ़: पंजाब सरकार द्वारा कॉटन बीज पर 33% सब्सिडी देने की योजना के बावजूद राज्य में किसानों का कपास की खेती से मोहभंग जारी है। कृषि विभाग के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष केवल 19,000 किसानों ने सब्सिडी योजना के तहत पंजीकरण कराया, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 52,000 थी। यानी योजना में पंजीकरण करीब 63 प्रतिशत घट गया है।सरकार ने वर्ष 2023 में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (PAU) द्वारा अनुशंसित प्रमाणित बीटी कॉटन हाइब्रिड और देसी कपास की किस्मों पर 33% सब्सिडी शुरू की थी। यह सहायता प्रति किसान अधिकतम पांच एकड़ तक सीमित है। इसके बावजूद योजना के चौथे वर्ष में भी दक्षिणी मालवा क्षेत्र के किसान कपास की खेती से दूरी बनाए हुए हैं, जबकि यह क्षेत्र कभी राज्य का प्रमुख कपास उत्पादक इलाका माना जाता था।कृषि विभाग के डिप्टी डायरेक्टर (कॉटन) चरणजीत सिंह ने बताया कि इस वर्ष राज्य में लगभग 80,000 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 1.19 लाख हेक्टेयर था। उनका कहना है कि अप्रैल में बुवाई के बाद हुई बेमौसम बारिश से खेतों की सतह पर मिट्टी की सख्त परत बन गई, जिससे बीजों का अंकुरण प्रभावित हुआ और कई पौधे नष्ट हो गए। दोबारा बुवाई में अधिक खर्च आने के कारण अधिकांश किसानों ने पुनः बुवाई नहीं की।उन्होंने यह भी बताया कि नहरों में समय पर सिंचाई जल उपलब्ध नहीं होने से किसानों की मुश्किलें और बढ़ीं। सफाई कार्यों के कारण पानी की आपूर्ति में देरी हुई, जबकि बठिंडा, मानसा और श्री मुक्तसर साहिब जिलों में छोटी नहरों के क्षतिग्रस्त होने से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित रही।राज्य के कृषि मंत्री गुरमीत सिंह खुडियन ने कहा कि विभाग देसी कपास की किस्म PBD-88 के प्रचार-प्रसार में अपेक्षित सफलता नहीं हासिल कर सका। उनके अनुसार, यह किस्म कई प्रमुख कीटों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहनशील है, कम लागत में उगाई जा सकती है और बेहतर उत्पादन देने की क्षमता रखती है।विशेषज्ञों का मानना है कि पंजाब में कपास की खेती को फिर से गति देने के लिए पिंक बॉलवर्म-रोधी अगली पीढ़ी की बोलगार्ड-III (Bollgard-III) जीएम कपास किस्मों की आवश्यकता होगी। फिलहाल PAU सहित कई संस्थान इसके परीक्षण कर रहे हैं और अंतिम निर्णय केंद्र सरकार द्वारा परीक्षण परिणामों के मूल्यांकन के बाद लिया जाएगा।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 3 पैसे गिरकर 94.57 पर खुला.

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