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भारत-चीन बढ़ाएंगे वैश्विक कपास व्यापार

ICAC: भारत और चीन बनेंगे ग्लोबल कॉटन ट्रेड के प्रमुख ग्रोथ ड्राइवरइंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) के अनुसार, 2026/27 सीज़न में भारत और चीन की मजबूत आयात मांग वैश्विक कॉटन व्यापार को नई गति दे सकती है। दोनों देशों की बढ़ती खरीदारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में व्यापारिक गतिविधियों को मजबूती देने वाली प्रमुख ताकत के रूप में उभर रही है।रिपोर्ट के मुताबिक, भारत वैश्विक कॉटन मांग को बढ़ाने वाले सबसे अहम देशों में शामिल हो गया है। 2025/26 सीज़न में देश का कॉटन लिंट आयात लगभग 10 लाख टन (1 मिलियन टन) रहने का अनुमान है, जो पिछले सीज़न की तुलना में 42% अधिक है। यह भारत के इतिहास का अब तक का सबसे ऊंचा आयात स्तर होगा।इस बढ़ोतरी के पीछे आयात शुल्क में अस्थायी कटौती और एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन पर दी गई छूट जैसे नीतिगत कदमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन उपायों से आयातित फाइबर की उपलब्धता बढ़ी है और घरेलू स्पिनिंग तथा टेक्सटाइल उद्योग की मांग को समर्थन मिला है।चीन के कॉटन आयात में भी उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद जताई गई है। पिछले सीज़न में आयात आठ वर्षों के सबसे निचले स्तर पर रहने के बाद, 2025/26 में चीन के कॉटन लिंट आयात में करीब 42% की वृद्धि का अनुमान है।ICAC का अनुमान है कि 2026/27 सीज़न में चीन एक बार फिर दुनिया का सबसे बड़ा कॉटन आयातक बन जाएगा और वैश्विक कॉटन आयात में उसकी हिस्सेदारी लगभग 19% होगी। अतिरिक्त आयात कोटा, घरेलू बाजार में मजबूत कीमतें और कपड़ा मिलों की निरंतर मांग इस बढ़ोतरी के प्रमुख कारण बताए गए हैं।चीन के प्रमुख सप्लायरों में ब्राज़ील सबसे आगे है। वर्तमान में चीन के कुल कॉटन आयात में ब्राज़ील की हिस्सेदारी करीब 52% है, जिससे वह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण कॉटन ट्रेड कॉरिडोर का प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया चीन के दूसरे सबसे बड़े सप्लायर के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में जारी बदलाव वैश्विक प्रतिस्पर्धा और कॉटन व्यापार के प्रवाह को प्रभावित कर रहे हैं।उत्पादन और खपत के मोर्चे पर, 2025/26 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 26.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 3% अधिक है। वहीं, वैश्विक खपत 25.3 मिलियन टन रहने की संभावना है, जो साल-दर-साल 1.6% की वृद्धि दर्शाती है।2026/27 सीज़न में वैश्विक कॉटन उत्पादन 2% घटकर 25.9 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत लगभग 1% बढ़कर 25.5 मिलियन टन तक पहुंच सकती है। ICAC का मानना है कि मजबूत मांग के चलते भारत और चीन आने वाले वर्षों में वैश्विक कॉटन व्यापार की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे।और पढ़ें:- भारतीय कपास उद्योग का परिदृश्य

भारतीय कपास उद्योग का परिदृश्य

भारतीय कॉटन सेक्टर पर नज़रभारत में उच्च गुणवत्ता वाले इम्पोर्टेड कॉटन की मांग लगातार बढ़ रही है। यद्यपि देश का कुल कॉटन उत्पादन घरेलू खपत के लिए पर्याप्त है, फिर भी फाइन काउंट यार्न, होम टेक्सटाइल और निर्यात-उन्मुख उत्पादों के निर्माण के लिए प्रीमियम गुणवत्ता वाले फाइबर की आवश्यकता आयात को बढ़ावा दे रही है। वर्तमान में भारत अपनी कुल कॉटन खपत का लगभग 9% आयात करता है, जबकि चीन की आयात निर्भरता 16–17% है। इससे अमेरिका, ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया जैसे प्रमुख निर्यातक देशों के लिए भारतीय बाजार में अवसर बढ़ रहे हैं।तमिलनाडु की जयलक्ष्मी टेक्सटाइल्स जैसी स्पिनिंग मिलें अपनी आवश्यकता का लगभग 20% इम्पोर्टेड कॉटन उपयोग करती हैं। कंपनी के अनुसार, अमेरिकी कॉटन में कम ट्रैश कंटेंट और बेहतर गुणवत्ता फाइन काउंट स्पिनिंग के लिए उपयुक्त है, यदि यह प्रतिस्पर्धी कीमत पर उपलब्ध हो।हाल के महीनों में वैश्विक टेक्सटाइल मांग में वृद्धि और चीन द्वारा भारतीय कॉटन यार्न की खरीद बढ़ने से घरेलू बाजार में कीमतों और उपलब्धता पर दबाव देखा गया। अब बाजार की दिशा काफी हद तक मॉनसून की प्रगति पर निर्भर करेगी। हालांकि शुरुआती चरण में वर्षा सामान्य से कम रही, विशेषज्ञों का मानना है कि इसका प्रभाव कपास पर चावल और गन्ने जैसी अधिक पानी वाली फसलों की तुलना में सीमित रहेगा। यदि किसान कम पानी वाली फसल के रूप में कपास का रकबा बढ़ाते हैं, तो उत्पादन में सुधार संभव है।कमोडिटी विश्लेषकों का अनुमान है कि कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में बेहतर वर्षा रहने पर 2026–27 सीजन में भारत का कॉटन उत्पादन 320 लाख गांठों से अधिक हो सकता है। इसके साथ ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की संभावनाएं भी उद्योग के लिए सकारात्मक मानी जा रही हैं। चूंकि कपास खाद्य फसल नहीं है और भारत में अधिकांश उत्पादन GMO आधारित है, इसलिए व्यापार समझौते में इसे शामिल करना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। भारतीय स्पिनिंग उद्योग भी प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए ड्यूटी-फ्री कॉटन आयात की मांग कर रहा है।बढ़ती गुणवत्ता मांग, संभावित व्यापार समझौते और वैश्विक टेक्सटाइल बाजार में भारत की मजबूत स्थिति को देखते हुए भारतीय कॉटन सेक्टर आने वाले वर्षों में विकास और निवेश के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान कर सकता है।और पढ़ें:- ट्रेड डील से टेक्सटाइल शेयरों में तेजी

ट्रेड डील से टेक्सटाइल शेयरों में तेजी

ट्रेड डील्स से भारतीय टेक्सटाइल स्टॉक्स में तेज़ी, एक्सपोर्ट बढ़ने की उम्मीदभारत के टेक्सटाइल सेक्टर में इस साल मजबूत तेजी देखने को मिल रही है। इसकी प्रमुख वजह ब्रिटेन (UK) के साथ इस महीने लागू होने जा रहा मुक्त व्यापार समझौता (FTA), यूरोपीय संघ (EU) के साथ अंतिम चरण में पहुंची बातचीत और अमेरिका (US) के साथ संभावित ट्रेड डील है। इन समझौतों से भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मजबूत होने की उम्मीद है।टी-शर्ट, बेड लिनन और टॉवल जैसे उत्पाद वॉलमार्ट, टेस्को और अन्य वैश्विक रिटेलर्स को सप्लाई करने वाली भारतीय कंपनियां शेयर बाजार की सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों में शामिल हैं। ब्लूमबर्ग के आठ प्रमुख टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स के इक्वल-वेट इंडेक्स में इस साल 30% से अधिक की बढ़त दर्ज की गई है, जबकि इसी अवधि में NSE निफ्टी 50 इंडेक्स में करीब 8% की गिरावट आई है।इक्विट्री कैपिटल एडवाइजर्स के को-फाउंडर और मुख्य निवेश अधिकारी पवन भरडिया का मानना है कि भारतीय टेक्सटाइल कंपनियों के लिए वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने का बड़ा अवसर है। उनके अनुसार, बेहतर टैरिफ व्यवस्था और नए निर्यात अवसरों के कारण इस सेक्टर की वैल्यूएशन में सुधार होना चाहिए। उनके पोर्टफोलियो में शामिल SP Apparels के शेयर इस साल करीब 60% चढ़ चुके हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि चीन और कुछ अन्य एशियाई देशों से सोर्सिंग कम करने की वैश्विक रणनीति का भी लाभ भारत को मिल सकता है। इसी उम्मीद के चलते SBI Funds Management और Quant Mutual Fund जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों ने हाल के महीनों में कई टेक्सटाइल कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है।अरविंद लिमिटेड के शेयर इस साल लगभग 74% और इंडो काउंट इंडस्ट्रीज के शेयर करीब 54% चढ़े हैं। मोतीलाल ओसवाल के विश्लेषकों का मानना है कि बड़े भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स बेहतर ऑर्डर विजिबिलिटी और वैश्विक ब्रांड्स की बढ़ती मांग का लाभ उठाकर आने वाले वर्षों में अपना मार्केट शेयर बढ़ा सकते हैं।हालांकि वैश्विक टेक्सटाइल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी अभी लगभग 4% है, लेकिन सरकार 2030 तक इस उद्योग का आकार 350 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यह लक्ष्य उत्पादन क्षमता बढ़ाने, नए निवेश आकर्षित करने और निर्यात ऑर्डर में लगातार वृद्धि पर निर्भर करेगा।और पढ़ें:- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.21 पर बिना किसी बदलाव के बंद हुआ।

अकोला में खरीफ बुवाई तेज, कपास बढ़ेगा

महाराष्ट्र: अच्छी बारिश से खरीफ बुवाई ने पकड़ी रफ्तार, 1.20 लाख हेक्टेयर में बुवाई पूरी; कपास के रकबे में बढ़ोतरी के आसारमहाराष्ट्र के अकोला जिले में जुलाई की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश से खरीफ सीजन की बुवाई ने रफ्तार पकड़ ली है। कृषि विभाग के अनुसार, जिले के कुल 4,32,010 हेक्टेयर खेती योग्य क्षेत्र में से अब तक करीब 1,20,000 हेक्टेयर में बुवाई पूरी हो चुकी है। पिछले वर्ष जिले में कुल 4,31,884 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई थी।इस वर्ष किसानों का रुझान कपास की खेती की ओर तेजी से बढ़ा है। कृषि अधिकारियों के मुताबिक, मूंग और उड़द की बुवाई का उपयुक्त समय समाप्त हो चुका है। ऐसे में अब इन फसलों की बुवाई करने पर उत्पादन प्रभावित होने और फसल खराब होने की आशंका है। इसी कारण अधिकांश किसानों ने कपास की खेती को प्राथमिकता दी है। अब तक जिले में कपास की लगभग 30 प्रतिशत बुवाई पूरी हो चुकी है और इस वर्ष इसके कुल रकबे में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।जिले में अब तक हुई वर्षा के आंकड़ों के अनुसार, तेलहारा तालुका में सबसे अधिक 191.7 मिमी बारिश दर्ज की गई है। इसके बाद अकोट में 161.3 मिमी, पातुर में 141.9 मिमी, मूर्तिजापुर में 132.9 मिमी, बरशीटाकली में 124.9 मिमी, बालापुर में 111.9 मिमी तथा अकोला तालुका में 95 मिमी वर्षा हुई है। जिले का औसत वर्षापात 132.2 मिमी दर्ज किया गया है।कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि अब मूंग और उड़द की बुवाई से बचें, क्योंकि इन फसलों का अनुकूल समय निकल चुका है। विभाग का कहना है कि इस समय बुवाई करने पर अपेक्षित उत्पादन मिलने की संभावना काफी कम रहती है। विशेष रूप से तेलहारा और पातुर क्षेत्र में शुरुआती बारिश और बुवाई में हुई देरी के कारण कई किसानों को अपनी मूल फसल योजना बदलकर कपास की खेती अपनानी पड़ रही है।हालांकि जिले में कुल मिलाकर बुवाई का कार्य तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन अकोट, तेलहारा और पातुर तालुका के कुछ हिस्सों में लगातार हो रही भारी बारिश से बुवाई प्रभावित हुई है। पातुर के निचले इलाकों में जलभराव और मिट्टी में अत्यधिक नमी के कारण कई स्थानों पर बुवाई का कार्य फिलहाल रुका हुआ है।और पढ़ें :- कपास भाव MSP से ऊपर पहुंचे

कपास भाव MSP से ऊपर पहुंचे

कॉटन मार्केट: कपास की कीमतों में एक हफ्ते में 5.24% की बढ़ोतरी, किसानों को मिल रहे MSP से अधिक भावदेश के कपास बाज़ार में एक बार फिर मजबूती देखने को मिल रही है। मंडियों में कपास की आवक लगातार घटने से कीमतों में अच्छी तेजी दर्ज की गई है। 28 जून को समाप्त सप्ताह के दौरान देश में कपास का औसत बाज़ार भाव बढ़कर ₹8,902 प्रति क्विंटल पहुंच गया, जो पिछले सप्ताह की तुलना में 5.24% अधिक है। नए कपास सीज़न की शुरुआत से पहले आई यह तेजी कपास उत्पादक किसानों के लिए राहतभरी खबर मानी जा रही है।बाज़ार विशेषज्ञों के अनुसार, कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह मंडियों में कपास की आवक में आई भारी गिरावट है। पिछले सप्ताह के मुकाबले देशभर की कृषि उपज मंडी समितियों (APMC) में कपास की कुल आवक 23.54% कम रही। महाराष्ट्र में इसका असर सबसे अधिक देखने को मिला, जहां मंडियों में कपास की आवक में 54.75% की गिरावट दर्ज की गई। सीमित स्टॉक के कारण व्यापारियों के बीच खरीद की प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे बाज़ार भाव मजबूत हुए।केंद्र सरकार ने 2025-26 सीज़न के लिए मीडियम-स्टेपल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ₹7,410 प्रति क्विंटल तय किया था, जबकि 2026-27 सीज़न के लिए इसे बढ़ाकर ₹8,267 प्रति क्विंटल कर दिया गया है। वर्तमान में खुले बाज़ार में मिल रहा औसत भाव नए MSP से भी अधिक है। ऐसे में किसान सरकारी खरीद केंद्रों के बजाय खुले बाज़ार में बिक्री कर बेहतर दाम प्राप्त कर रहे हैं।प्रमुख मंडियों की बात करें तो अमरावती में कपास का औसत भाव ₹8,955 प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो सबसे अधिक रहा। इसके अलावा राजकोट में ₹8,902, परभणी में ₹8,304 और बुलढाणा में ₹8,200 प्रति क्विंटल का औसत भाव दर्ज हुआ।आने वाले दिनों में कपास की कीमतों का रुख नए सीज़न की बुवाई, मॉनसून की प्रगति, घरेलू मांग और वैश्विक बाज़ार की स्थिति पर निर्भर करेगा। हालांकि, जब तक पुराने सीज़न का स्टॉक सीमित रहेगा, तब तक कीमतों को समर्थन मिलने की संभावना बनी रह सकती है। इसलिए जिन किसानों के पास अभी भी कपास का स्टॉक है, वे बाज़ार की गतिविधियों पर नज़र रखते हुए उचित समय पर बिक्री का फैसला कर सकते हैं।और पढ़ें :- रुपया 18 पैसे मजबूत होकर 95.21 प्रति डॉलर पर खुला.

प्रमुख राज्यों में कपास बुवाई सुस्त

देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई की रफ्तार धीमी, पिछले वर्ष से कम रकबाभारत के तीन सबसे बड़े कपास उत्पादक राज्यों—गुजरात, महाराष्ट्र और तेलंगाना—में कपास की बुआई पिछले साल के स्तर से कम रही है, जिससे पता चलता है कि 2026-27 खरीफ सीज़न की शुरुआत धीमी रही है। संबंधित राज्य कृषि विभागों द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, तीनों राज्यों में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में बुआई कम हुई है, जिसमें महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा गिरावट देखी गई है।महाराष्ट्र में, कपास की सीधी बुआई पिछले साल इसी अवधि में दर्ज 25.57 लाख हेक्टेयर से घटकर 7.27 लाख हेक्टेयर रह गई है। राज्य ने तीन प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई में सबसे बड़ी कमी दर्ज की है, जो रोपाई की गतिविधि में काफी देरी को दर्शाता है।गुजरात में भी कपास के रकबे (खेती के क्षेत्र) में काफी गिरावट दर्ज की गई है। बुआई पिछले साल के 13.99 लाख हेक्टेयर से घटकर इस सीज़न में 6.84 लाख हेक्टेयर रह गई है, जिसका मुख्य कारण सौराष्ट्र क्षेत्र में धीमी रोपाई है। हालाँकि, उत्तर और मध्य गुजरात के कुछ जिलों में तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रगति देखी गई है।तीनों राज्यों में, तेलंगाना में साल-दर-साल सबसे कम गिरावट दर्ज की गई है। कपास की बुआई 26.83 लाख एकड़ है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 30.69 लाख एकड़ थी। नलगोंडा, संगारेड्डी और रंगारेड्डी जैसे जिलों में बढ़ी हुई बुआई ने अन्य कपास उत्पादक क्षेत्रों में आई गिरावट की आंशिक रूप से भरपाई की है।बाज़ार के जानकारों का मानना है कि बुआई में मौजूदा सुस्ती का मुख्य कारण प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्रों में मॉनसून की बारिश में देरी और असमानता है। जुलाई के दौरान दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की प्रगति महत्वपूर्ण रहेगी, क्योंकि समय पर बारिश से बुआई के काम में तेज़ी आ सकती है और 2026-27 सीज़न के लिए कपास के अंतिम रकबे पर असर पड़ सकता है।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 47 पैसे गिरकर 95.39 पर बंद हुआ।

आंध्र में कपास बुवाई 158% बढ़ी

आंध्र प्रदेश में कपास की बुवाई में तेज़ वृद्धि, 1.86 लाख हेक्टेयर के पार पहुंचा रकबा आंध्र प्रदेश में खरीफ-2026 सीजन के दौरान कपास की बुवाई में इस वर्ष उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। राज्य कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, 1 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह तक राज्य में कुल 1,86,280 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई पूरी हो चुकी है। यह पिछले वर्ष इसी अवधि के 72,282 हेक्टेयर के मुकाबले लगभग 158 प्रतिशत अधिक है, जो किसानों की बढ़ती भागीदारी और अनुकूल मौसम परिस्थितियों को दर्शाता है।राज्य का कुल कपास बुवाई लक्ष्य 5,14,858 हेक्टेयर निर्धारित किया गया है, जिसमें से अब तक लगभग 36 प्रतिशत क्षेत्र में बुवाई हो चुकी है। सामान्य रूप से इस अवधि तक केवल 58,452 हेक्टेयर में बुवाई होती है, लेकिन इस वर्ष यह आंकड़ा सामान्य से 319 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया है, जो खरीफ सीजन की मजबूत शुरुआत को दर्शाता है।जिलावार आंकड़ों के अनुसार कुर्नूल जिला कपास उत्पादन में सबसे आगे है, जहां अब तक 1,30,662 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो चुकी है। इसके बाद पलनाडु में 19,413 हेक्टेयर, अनंतपुरम में 12,846 हेक्टेयर, एनटीआर जिले में 8,989 हेक्टेयर और वाईएसआर कडप्पा में 4,955 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई दर्ज की गई है। इसके अलावा नांदयाल, श्री सत्यसाई, मार्कापुरम, प्रकाशम, एसपीएसआर नेल्लोर, काकीनाडा, एलुरु, कृष्णा और तिरुपति जैसे जिलों में भी अलग-अलग स्तर पर बुवाई की गई है।हालांकि, राज्य के कुछ जिलों जैसे विशाखापत्तनम, पश्चिम गोदावरी, बापटला, चित्तूर, अन्नमय्या, पोलावरम, अनकापल्ली, अल्लूरी सीतारामाराजू और कोनसीमा में कपास की बुवाई अभी भी बेहद कम या शून्य स्तर पर है।कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस वर्ष मानसून की शुरुआत अपेक्षाकृत अनुकूल रही है, जिसके कारण किसानों ने समय पर बुवाई की है। यदि आने वाले हफ्तों में बारिश की स्थिति सामान्य रहती है, तो कपास का कुल रकबा और बढ़ने की संभावना है। इससे राज्य में इस वर्ष कपास उत्पादन में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है।और पढ़ें :- कर्नाटक में जून में 42% बारिश की कमी

कर्नाटक में जून में 42% बारिश की कमी

कर्नाटक में जून 2026 में पिछले 50 वर्षों की चौथी सबसे कम बारिश, 42% की कमी दर्जहुबली: कर्नाटक में जून 2026 पिछले पांच दशकों में जून महीने की बारिश के लिहाज से चौथा सबसे कमजोर वर्ष रहा। राज्य में इस दौरान केवल 116 मिमी वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य 199 मिमी की तुलना में 42 प्रतिशत कम है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई, जलाशयों के जलस्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।राज्य में जून महीने में सबसे कम वर्षा 2023 में दर्ज की गई थी, जब केवल 87 मिमी बारिश हुई थी। 1976 से 2026 के बीच 21 से अधिक वर्षों में जून की वर्षा सामान्य से कम रही, जबकि 19 वर्षों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई। सबसे अधिक वर्षा 1991 में 294 मिमी हुई थी।कमजोर मॉनसून का असर जलाशयों पर भी दिखाई दे रहा है। होसापेटे के पास स्थित तुंगभद्रा जलाशय में 28 जून 2026 को जल स्तर केवल 9.47 टीएमसीफुट था, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 61.88 टीएमसीफुट था। कैचमेंट क्षेत्र में कमजोर वर्षा के कारण पूरे महीने जलाशय में पानी की आवक बेहद कम रही।कर्नाटक राज्य प्राकृतिक आपदा प्रबंधन केंद्र के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में जून के दौरान औसत से कम बारिश वाले वर्षों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2000 के बाद से राज्य में जून की वर्षा का पैटर्न अधिक अनिश्चित हो गया है, जिससे कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।कृषि-अर्थशास्त्री प्रकाश कम्मार्डी के अनुसार, दक्षिण कर्नाटक में रागी तथा उत्तर कर्नाटक में ज्वार, सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की खेती जून की बारिश पर काफी निर्भर करती है। यदि समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो किसान बुवाई में देरी करते हैं या कई बार बुवाई टाल देते हैं, जिससे उत्पादन और आय दोनों प्रभावित होते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के वर्षों में कुल मॉनसून वर्षा सामान्य से अधिक रही है, लेकिन इस वर्ष अल नीनो (El Niño) के प्रभाव से जुलाई में भी बारिश प्रभावित होने की आशंका है। यदि ऐसा हुआ, तो राज्य में कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण आजीविका पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।और पढ़ें :- आदिलाबाद में खरीफ बुवाई तेज

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