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वैश्विक कपास बाजार में भारत की स्थिति मजबूत, उत्पादन और खपत में दूसरे स्थान पर

भारत का कॉटन सेक्टर वैश्विक बाजार में मजबूत कर रहा अपनी स्थितिनई दिल्ली: भारत ग्लोबल कॉटन इंडस्ट्री में अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रहा है। कॉटन की खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि कॉटन उत्पादन और खपत दोनों के लिहाज से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।वर्ष 2025-26 में भारत का कॉटन उत्पादन 290.91 लाख बेल अनुमानित है, जबकि घरेलू खपत 328 लाख बेल तक पहुंचने की संभावना है। वैश्विक फाइबर उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 19% है। वहीं, वर्ष 2024-25 में भारत की वैश्विक कॉटन एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी वैल्यू के आधार पर लगभग 3.37% रही, जिसकी कीमत करीब 11.49 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी।भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां कॉटन की सभी चार मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें गॉसिपियम आर्बोरियम (Gossypium arboreum) और गॉसिपियम हर्बेशियम (Gossypium herbaceum) — एशियन कॉटन, गॉसिपियम बारबाडेंस (Gossypium barbadense) — इजिप्शियन, सी आइलैंड और पेरूवियन कॉटन तथा गॉसिपियम हिरसुटम (Gossypium hirsutum) — अमेरिकन या अपलैंड कॉटन शामिल हैं।तीन एग्रो-इकोलॉजिकल ज़ोन में फैली खेतीकॉटन एक खरीफ और सेमी-ज़ीरोफाइट फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से ट्रॉपिकल और सबट्रॉपिकल क्षेत्रों में की जाती है। इसकी बेहतर वृद्धि के लिए 21–27°C तापमान, कम से कम 210 फ्रॉस्ट-फ्री दिन और 50–100 सेमी वर्षा उपयुक्त मानी जाती है।कॉटन के लिए अच्छी जल निकासी वाली काली (रेगुर) मिट्टी और एल्यूवियल मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।भारत में कॉटन की खेती नौ प्रमुख राज्यों में तीन एग्रो-इकोलॉजिकल ज़ोन में फैली हुई है:नॉर्दर्न ज़ोन: पंजाब, हरियाणा और राजस्थानसेंट्रल ज़ोन: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेशसदर्न ज़ोन: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटककॉटन सेक्टर के सामने प्रमुख चुनौतियांभारत के कॉटन सेक्टर की प्रमुख चुनौतियों में कम उत्पादकता शामिल है। अनियमित वर्षा, सूखे की स्थिति और लगभग 67% कॉटन क्षेत्र का बारिश आधारित खेती पर निर्भर होना उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है।इसके अलावा, पिंक बॉलवर्म और अन्य कीटों का प्रकोप फसल नुकसान बढ़ाता है और किसानों की लागत में वृद्धि करता है।कॉटन बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, सीमित बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर और आय से जुड़े जोखिम किसानों को प्रभावित करते हैं। वहीं, एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन का सीमित उत्पादन और फाइबर गुणवत्ता में असमानता भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा के सामने चुनौती बनी हुई है।उत्पादकता बढ़ाने, बेहतर गुणवत्ता वाले कॉटन के उत्पादन और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने से भारत वैश्विक कॉटन सप्लाई चेन में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है।और पढ़ें :- हरियाणा के डबवाली में नहर टूटने से 15 एकड़ कपास की फसल प्रभावित, किसानों ने खुद संभाला मोर्चा

हरियाणा के डबवाली में नहर टूटने से 15 एकड़ कपास की फसल प्रभावित, किसानों ने खुद संभाला मोर्चा

हरियाणा: डबवाली में नहर टूटने से 15 एकड़ कपास की फसल प्रभावित, किसानों ने खुद बंद किया कटावहिसार (हरियाणा): हरियाणा के सिरसा जिले के डबवाली उपमंडल के सकता खेड़ा गांव के पास मंगलवार को सिंचाई विभाग की लापरवाही उस समय सामने आई, जब मौजगढ़ हेड से निकलने वाली लोहगढ़ माइनर की लिंक नहर टूट गई। नहर का पानी आसपास के खेतों में भरने से करीब 15 एकड़ कपास की फसल प्रभावित हुई और किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा।बताया गया कि नहर किसान हजूर सिंह मान की जमीन के पास क्षतिग्रस्त हुई, जिससे तेज़ी से पानी खेतों में फैलने लगा। किसानों का आरोप है कि सूचना देने के बावजूद सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारी समय पर मौके पर नहीं पहुंचे। विभाग की ओर से केवल एक कर्मचारी मौजूद था, जिसके कारण स्थिति संभालने की जिम्मेदारी किसानों को खुद उठानी पड़ी।आसपास के ग्रामीण और किसान तुरंत मौके पर पहुंचे तथा मिट्टी और मलबे की मदद से नहर के कटाव को भरने का काम शुरू किया। किसानों ने देर रात तक लगातार मेहनत कर पानी के बहाव को नियंत्रित किया, जिससे नुकसान को और बढ़ने से रोका जा सका।स्थानीय किसान नेता मिट्ठू कंबोज ने कहा कि यदि किसानों ने तत्काल पहल नहीं की होती, तो फसल का नुकसान कहीं अधिक होता। उन्होंने बताया कि संबंधित नहर लंबे समय से जर्जर हालत में है और इसकी मरम्मत तथा कंक्रीट से पुनर्निर्माण की मांग कई बार की जा चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।किसान संगठनों का कहना है कि हरियाणा के डबवाली क्षेत्र की कई पुरानी नहरें खराब रखरखाव के कारण बार-बार टूट रही हैं, जिससे किसानों की फसलें और कृषि भूमि लगातार खतरे में बनी रहती हैं। संगठनों ने हरियाणा सरकार से पूरे क्षेत्र के सिंचाई ढांचे का व्यापक सर्वे कराने और जर्जर नहरों के पुनर्निर्माण की मांग की है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।और पढ़ें :- अल नीनो से भारत में कपास की खेती बढ़ने की उम्मीद, टेक्सटाइल उद्योग को अस्थायी राहत

अल नीनो से भारत में कपास की खेती बढ़ने की उम्मीद, टेक्सटाइल उद्योग को अस्थायी राहत

अल-नीनो के बीच कपास की खेती बढ़ने की उम्मीद, फिलहाल टेक्सटाइल उद्योग को राहतनई दिल्ली: अल-नीनो के कारण सामान्य से कम बारिश की आशंका भारतीय कपास क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम वर्षा की स्थिति में किसान अधिक पानी की मांग करने वाली फसलों के बजाय कपास की खेती को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिससे शुरुआती बुआई में आई कमी की भरपाई संभव है।कृषि मंत्रालय के अनुसार, 17 जुलाई तक देश में 92.53 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 98.39 लाख हेक्टेयर की तुलना में 5.96% कम है। महाराष्ट्र और गुजरात में बुआई घटी है, जबकि तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में वृद्धि दर्ज की गई है।कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एल. के. गुप्ता ने कहा कि यदि बारिश सीमित रहती है, तो किसान कपास की खेती की ओर अधिक आकर्षित होंगे, क्योंकि यह फसल अपेक्षाकृत कम पानी में भी अच्छी पैदावार दे सकती है। उन्होंने भरोसा जताया कि घरेलू टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे कपास की उपलब्धता पर्याप्त रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि CCI मिलों को सीधे कपास उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है, ताकि कीमतें नियंत्रित रहें और किसानों को बेहतर मूल्य मिल सके।सरकार ने अक्टूबर 2026 तक कच्चे कपास के आयात पर लगने वाले लगभग 11% आयात शुल्क में छूट दी है। इससे नई घरेलू फसल आने तक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित रहने और टेक्सटाइल उत्पादों की कीमतों पर दबाव कम रहने की उम्मीद है।हालांकि, उद्योग विशेषज्ञों ने वैश्विक जोखिमों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी है। तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राजा एम. षणमुगम के अनुसार, अल-नीनो का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है। यदि प्रमुख कपास उत्पादक देशों में उत्पादन घटता है, तो वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और कच्चे माल की कीमतें बढ़ सकती हैं। ऐसे में CCI का बफर स्टॉक और समय पर आपूर्ति उद्योग के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में भारत का कच्चे कपास का आयात 54.9% बढ़कर 1.89 अरब डॉलर पहुंच गया, जबकि निर्यात 33.9% घटकर 436.37 मिलियन डॉलर रह गया। फिलहाल घरेलू बाजार में स्थिति स्थिर है, लेकिन वैश्विक कपास आपूर्ति पर अल-नीनो का प्रभाव आगे भी नजर बनाए रखने वाला प्रमुख कारक रहेगा।और पढ़ें :- भारत का सफेद सोना: कपास से समृद्धि तक

भारत का सफेद सोना: कपास से समृद्धि तक

भारत का 'सफेद सोना': खेत से कपड़े तक खुशहाली का ताना-बानाभारत के कपास के खेतों से लेकर दुनिया भर के लोगों के कपड़ों तक, कपास खेती, उद्योग, व्यापार और आजीविका को आपस में जोड़ता है। अक्सर 'सफेद सोना' (White Gold) कहे जाने वाले कपास को भारत की सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसलों में से एक माना जाता है। यह लगभग 60 लाख किसानों की मदद करता है और प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और व्यापार के क्षेत्रों में 4 से 5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। भारत दुनिया के कुल कपास फाइबर उत्पादन का लगभग 23% हिस्सा पैदा करता है, जिससे कपास देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और निर्यात क्षेत्र का एक अहम आधार बन गया है।भारत का कपास से नाता हजारों साल पुराना है, जब इसके कपड़ों की एशिया और यूरोप में बहुत मांग थी। स्वदेशी आंदोलन के दौरान, कपास आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया था, और आज भी यह 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन के तहत उस विरासत को आगे बढ़ा रहा है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कपास की चारों मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती होती है। कपास की खेती के रकबे (क्षेत्रफल) के मामले में यह दुनिया में पहले स्थान पर है और उत्पादन व खपत के मामले में दूसरे स्थान पर है; 2025-26 में यहाँ लगभग 291 लाख गांठों (bales) का उत्पादन हुआ।कपास की खेती मुख्य रूप से ग्यारह राज्यों में होती है, जिसमें से लगभग 62% खेती बारिश पर निर्भर (rain-fed) होती है। फाइबर के अलावा, कपास के बीज से खाने का तेल, पशुओं का चारा, बायोमास ईंधन और सर्जिकल कॉटन मिलता है, जिससे यह फसल टेक्सटाइल उद्योग के अलावा भी बहुत मूल्यवान बन जाती है।सरकार ने इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई तरह की रणनीतियां अपनाई हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से किसानों को अच्छी कमाई सुनिश्चित होती है, जबकि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) तब कपास की खरीद करता है जब बाजार भाव MSP से नीचे गिर जाते हैं। 2025-26 सीजन के दौरान, CCI ने ₹41,530 करोड़ मूल्य की 105 लाख से अधिक गांठों की खरीद की, जिससे लाखों किसानों को फायदा हुआ।उत्पादकता बढ़ाने के लिए, 'मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी' का लक्ष्य जलवायु-अनुकूल, कीट-प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित करना है, जिसमें 'एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल' (ELS) कपास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन' के तहत बेहतर बुवाई तकनीकों के प्रदर्शन से पैदावार में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।'कपास किसान ऐप' जैसी डिजिटल पहलों ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, स्लॉट बुकिंग और आधार-लिंक्ड भुगतान की सुविधा देकर MSP खरीद को पारदर्शी और किसान-अनुकूल बना दिया है। वहीं, 'कस्तूरी कॉटन भारत' सर्टिफिकेशन, ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसेबिलिटी और गुणवत्ता आश्वासन के जरिए भारतीय कपास को एक प्रीमियम ग्लोबल ब्रांड के तौर पर स्थापित कर रहा है। भारत ग्लोबल कॉटन ट्रेड में भी एक अहम भूमिका निभाता है और अमेरिका, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे बड़े बाज़ारों में फ़ाइबर, यार्न, फ़ैब्रिक और कपड़े एक्सपोर्ट करता है।इतिहास से जुड़े होने के बावजूद इनोवेशन से आगे बढ़ रहा भारत का कॉटन सेक्टर, बेहतर टेक्नोलॉजी, मज़बूत पॉलिसी सपोर्ट और बाज़ार तक बेहतर पहुँच के ज़रिए लगातार तरक्की कर रहा है। खेत से लेकर फ़ैब्रिक तक, कॉटन लाखों लोगों की आजीविका को जोड़ने वाला एक अहम ज़रिया बना हुआ है, साथ ही यह भारत की एग्रीकल्चरल इकॉनमी और ग्लोबल टेक्सटाइल लीडरशिप को भी मज़बूत करता है।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 13 पैसे गिरकर 96.36 पर खुला.

महाराष्ट्र: अहिल्यानगर में कपास की खेती का रकबा 1.33 लाख हेक्टेयर के पार

महाराष्ट्र: अहिल्यानगर में कपास का रकबा 1.33 लाख हेक्टेयर के पारअहिल्यानगर, महाराष्ट्र: महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में इस साल मानसून की देरी और कई क्षेत्रों में कम बारिश के बावजूद किसानों ने कपास की खेती को प्राथमिकता दी है। जिले में अब तक 1,33,010 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हो चुकी है। तालुका-वार आंकड़ों के अनुसार, शेवगांव में कपास का सबसे अधिक रकबा दर्ज किया गया है, जबकि इसके बाद नेवासा और पाथर्डी का स्थान है।जिले में खरीफ फसलों का औसत क्षेत्रफल 5,79,768 हेक्टेयर है। इस वर्ष मानसून करीब एक महीने की देरी से पहुंचा, जिसका सीधा असर खरीफ फसलों की बुवाई पर पड़ा। बारिश देर से होने के कारण कपास की बुवाई भी निर्धारित समय के मुकाबले पीछे रही। इसके बावजूद किसानों ने कपास को प्रमुख फसलों में शामिल रखा है।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कपास की बुवाई का समय लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में इस वर्ष जिले में कपास का कुल रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम रहने की संभावना जताई जा रही है। अकोले तालुका में अब तक कपास की बुवाई नहीं हुई है। वहीं, अहिल्यानगर, जामखेड़, कोपरगांव, पारनेर और राहाता तालुकाओं में कपास का रकबा अपेक्षाकृत कम है।शेवगांव तालुका 42,037 हेक्टेयर कपास क्षेत्र के साथ जिले में सबसे आगे है। इसके बाद नेवासा में 29,383 हेक्टेयर और पाथर्डी में 26,382 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई है। राहुरी में भी 18,623 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती दर्ज की गई है।जिले के कई हिस्सों में अभी भी पर्याप्त बारिश का इंतजार है। अकोले तालुका के पश्चिमी हिस्से को छोड़कर कई क्षेत्रों में बारिश की कमी बनी हुई है। कम बारिश की स्थिति में कपास की फसल प्रभावित होने की आशंका है। किसानों को अब आगे होने वाली बारिश से फसल की स्थिति में सुधार की उम्मीद है।देर से हुई बारिश के बावजूद कपास किसानों की प्रमुख पसंद बना हुआ है। हालांकि, अंतिम बुवाई आंकड़े जारी होने के बाद ही पिछले वर्ष की तुलना में कपास के रकबे में वास्तविक कमी या बढ़ोतरी की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।और पढ़ें :- US डॉलर के मुकाबले रुपया 18 पैसे मजबूत होकर 96.23 पर बंद हुआ

US डॉलर के मुकाबले रुपया 18 पैसे मजबूत होकर 96.23 पर बंद हुआ

मंगलवार को US डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 18 पैसे मजबूत हुआ और 96.23 पर बंद हुआ।मंगलवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.41 पर खुला और 96.23 पर बंद हुआ, जिससे ट्रेडिंग सेशन के दौरान इसमें 18 पैसे की मजबूत दर्ज की गई।मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार गिरावट के साथ बंद हुए। सेंसेक्स 238.41 अंक या 0.31 प्रतिशत गिरकर 77,470.11 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 50.80 अंक या 0.21 प्रतिशत गिरकर 24,187.70 पर बंद हुआ।बाजार का रुख मिला-जुला रहा; 2,087 शेयरों में बढ़त हुई, 1,942 शेयरों में गिरावट आई और 180 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ।और पढ़ें :- राजस्थान में खरीफ बुवाई 11,011 हजार हेक्टेयर पहुंची, लक्ष्य का 67% हासिल

राजस्थान में खरीफ बुवाई 11,011 हजार हेक्टेयर पहुंची, लक्ष्य का 67% हासिल

राजस्थान में खरीफ बुवाई 11,011.443 हजार हेक्टेयर तक पहुंची, लक्ष्य का 67% पूराराजस्थान में खरीफ 2026 की बुवाई तेजी से आगे बढ़ रही है। कृषि विभाग की 17 जुलाई 2026 की संशोधित रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में कुल खरीफ फसलों की बुवाई 11,011.443 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में हो चुकी है। यह निर्धारित 16,539 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य का 67 प्रतिशत है।रिपोर्ट के अनुसार, अनाज फसलों की बुवाई 4,425.537 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 75 प्रतिशत है। इनमें बाजरे की बुवाई 2,882.775 हजार हेक्टेयर में हुई है। इसके अलावा मक्का 862.178 हजार हेक्टेयर, ज्वार 489.301 हजार हेक्टेयर और धान 190.848 हजार हेक्टेयर में बोया गया है।दलहनी फसलों के तहत कुल 2,662.720 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जो लक्ष्य का 64 प्रतिशत है। इसमें मूंग की बुवाई 1,822.561 हजार हेक्टेयर, मोठ 473.481 हजार हेक्टेयर, उड़द 308.756 हजार हेक्टेयर, चवला 54.684 हजार हेक्टेयर और अरहर 3.121 हजार हेक्टेयर में हुई है।तिलहनी फसलों की कुल बुवाई 1,948.667 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 71 प्रतिशत है। इसमें मूंगफली की बुवाई 987.465 हजार हेक्टेयर और सोयाबीन की 854.558 हजार हेक्टेयर में हुई है।अन्य फसलों में ग्वार की बुवाई 1,152.661 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो लक्ष्य का 45 प्रतिशत है। वहीं कपास की बुवाई 526.307 हजार हेक्टेयर में हुई है, जो निर्धारित 720 हजार हेक्टेयर के लक्ष्य का 73 प्रतिशत है। गन्ने की बुवाई 4.625 हजार हेक्टेयर में हुई है।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान में खरीफ बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में कई प्रमुख फसलों में आगे चल रही है। हालांकि, कुल बुवाई अभी निर्धारित लक्ष्य के 67 प्रतिशत तक पहुंची है और आगामी दिनों में खरीफ फसलों का रकबा और बढ़ने की संभावना है।और पढ़ें :- भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: 2031 तक उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य

भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: 2031 तक उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य

भारत का ‘सफेद सोना’ कपास: उत्पादन और वैश्विक बाजार में पकड़ मजबूत करने पर जोरनई दिल्ली: भारत वैश्विक कपास उद्योग में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। सोमवार को जारी सरकारी फैक्टशीट के अनुसार, कपास की खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि कपास के उत्पादन और खपत दोनों में दूसरे स्थान पर है।सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 290.91 लाख गांठ रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत करीब 328 लाख गांठ रहने की उम्मीद है। भारत वैश्विक फाइबर उत्पादन में लगभग 19 प्रतिशत का योगदान देता है।सरकार ने कहा कि कपास क्षेत्र से जुड़ी हालिया पहल उत्पादकता, गुणवत्ता, बाजार तक पहुंच और मूल्यवर्धन बढ़ाने पर केंद्रित हैं। कीमतों में गिरावट के दौरान किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से मूल्य समर्थन मिलता है। इसके अलावा, ‘मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी’ के तहत वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन बढ़ाकर 498 लाख गांठ करने का लक्ष्य रखा गया है।सरकार के अनुसार, तकनीक प्रदर्शन, डिजिटल खरीद और ट्रेसेबिलिटी जैसी पहल कपास की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार कर रही हैं। इनसे वैश्विक कपास बाजार में भारतीय किसानों और उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होने की उम्मीद है।कपास के आर्थिक महत्व के कारण इसे भारत का ‘सफेद सोना’ कहा जाता है। यह फसल करीब 60 लाख किसानों की आजीविका का आधार है। देश में कपास की खेती लगभग 114.84 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। वहीं, प्रोसेसिंग, व्यापार और टेक्सटाइल वैल्यू चेन से जुड़ी गतिविधियों में करीब 4-5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है।फाइबर, धागे, कपड़े और गारमेंट्स के निर्यात के जरिए कपास विदेशी मुद्रा अर्जित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 2024-25 में भारत ने करीब 18 लाख गांठ कपास का निर्यात किया, जो वैश्विक कपास निर्यात का लगभग 3.37 प्रतिशत था। वित्त वर्ष 2024-25 में कपास निर्यात का मूल्य 11.49 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।भारतीय कॉटन टेक्सटाइल और मेड-अप उत्पादों का सबसे बड़ा बाजार अमेरिका रहा, जिसकी निर्यात में 26.35 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। इसके बाद बांग्लादेश, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त अरब अमीरात प्रमुख बाजार रहे।भारत में कपास की खेती मुख्य रूप से नौ राज्यों में होती है। इन्हें उत्तरी, मध्य और दक्षिणी कृषि-जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है। इसके अलावा, ओडिशा और तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है।और पढ़ें :- भारत फिर से वैश्विक कपड़ा व्यापार में नेतृत्व हासिल करने की राह पर

भारत फिर से वैश्विक कपड़ा व्यापार में नेतृत्व हासिल करने की राह पर

कभी टेक्सटाइल व्यापार में भारत का दबदबा था, अब वैश्विक पहचान फिर बनाने की चुनौतीनई दिल्ली: कभी भारत दुनिया के प्रमुख टेक्सटाइल व्यापारिक केंद्रों में शामिल था। आज देश के पास कपास उत्पादन से लेकर कताई, बुनाई, प्रोसेसिंग, परिधान निर्माण और निर्यात तक टेक्सटाइल की पूरी वैल्यू चेन मौजूद है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी रोजगार पैदा करने की क्षमता है। हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत को मजबूत संस्थानों, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक रणनीति की जरूरत है।बहुत कम उद्योगों ने भारत की सभ्यता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर टेक्सटाइल उद्योग जितना गहरा प्रभाव डाला है। ग्लोबल वैल्यू चेन की आधुनिक अवधारणा के सामने आने से हजारों वर्ष पहले ही कपड़ा निर्माण भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक ताने-बाने का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका था।हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में हुई खुदाई से तकली, सुई और कपड़ा निर्माण तथा रंगाई से जुड़ी वस्तुओं के प्रमाण मिले हैं। ये भारत में टेक्सटाइल गतिविधियों के शुरुआती प्रमाणों में शामिल हैं। सिंधु घाटी सभ्यता में विकसित हुई यह परंपरा बाद की सदियों में व्यापार, नवाचार और उत्कृष्ट कारीगरी के माध्यम से आगे बढ़ती रही।लगभग दो हजार वर्षों तक भारतीय कपड़ों की एशिया और यूरोप के बाजारों में मजबूत मांग रही। मुगल काल के दौरान बंगाल सूती टेक्सटाइल उत्पादन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। ढाका की महीन मलमल अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी काफी मांग थी। वहीं, मुर्शिदाबाद रेशम और अन्य उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्रों के व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरा।अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 1700 में वैश्विक आर्थिक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग एक-चौथाई थी। इसके बाद औद्योगिक क्रांति ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप बदल दिया। जेम्स हारग्रीव्स की स्पिनिंग जेनी और बुनाई से जुड़ी अन्य मशीनों ने बड़े पैमाने पर उत्पादन को बढ़ावा दिया। प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त अब केवल कारीगरों के कौशल पर निर्भर नहीं रही, बल्कि तकनीक, उत्पादकता और बड़े पैमाने पर उत्पादन पर आधारित हो गई।इस बदलाव के बाद भारत धीरे-धीरे ब्रिटेन के लंकाशायर क्षेत्र की मिलों के लिए कच्चे कपास का प्रमुख आपूर्तिकर्ता और तैयार कपड़ों के लिए एक बड़ा बाजार बन गया।आज भारत के सामने चुनौती केवल अपने गौरवशाली टेक्सटाइल अतीत को दोहराने की नहीं, बल्कि आधुनिक वैश्विक टेक्सटाइल शक्ति के रूप में अपनी नई पहचान बनाने की है। इसके लिए मजबूत संस्थानों, आधुनिक तकनीक, नवाचार, कुशल कार्यबल और पूरी वैल्यू चेन के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी।और पढ़ें :- भारत-यूके व्यापार समझौते से FY31 तक निर्यात लगभग दोगुना होने का अनुमान

भारत-यूके व्यापार समझौते से FY31 तक निर्यात लगभग दोगुना होने का अनुमान

भारत-UK ट्रेड एग्रीमेंट से FY31 तक एक्सपोर्ट लगभग दोगुना हो सकता है; टेक्सटाइल और लेदर सेक्टर को सबसे ज़्यादा फ़ायदाबैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत-UK कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) लागू होने के बाद, UK को भारत का एक्सपोर्ट FY26 में $13.5 बिलियन से बढ़कर FY31 तक $24.2 बिलियन होने का अनुमान है।15 जुलाई को लागू हुए इस ट्रेड एग्रीमेंट से UK भेजे जाने वाले लगभग सभी सामानों पर टैरिफ खत्म होने से भारतीय एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी की उम्मीद है। रिपोर्ट का अनुमान है कि दोनों देशों के बीच आपसी व्यापार FY26 में $25.1 बिलियन से बढ़कर FY31 तक $41 बिलियन हो सकता है, जिसमें भारत का एक्सपोर्ट इंपोर्ट से ज़्यादा तेज़ी से बढ़ने की उम्मीद है, जिससे ट्रेड सरप्लस और बढ़ेगा।टेक्सटाइल और कपड़ों को फ़ायदायह एग्रीमेंट भारतीय टेक्सटाइल और कपड़ों के एक्सपोर्ट पर पहले लगने वाले लगभग 12% टैरिफ को हटाता है, जिससे भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे प्रतिस्पर्धियों के बराबर मौका मिलता है।बैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च का अनुमान है कि अगले पांच सालों में इस सेक्टर से एक्सपोर्ट $2.1 बिलियन से बढ़कर $3.1 बिलियन हो सकता है। कंपनी की जानकारी के अनुसार, UK में अच्छी मौजूदगी वाली लिस्टेड कंपनियों में गोकलदास एक्सपोर्ट्स, KPR मिल और वेलस्पन लिविंग शामिल हैं।लेदर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी फ़ायदारिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग 99% हिस्सा अब UK में बिना टैरिफ के भेजा जा सकेगा। इससे टेक्सटाइल और लेदर जैसे ज़्यादा लेबर वाले सेक्टर के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग सामान जैसे मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ने की उम्मीद है।इंपोर्ट के मामले में, भारत ने टैरिफ कम करने के लिए चरणबद्ध तरीका अपनाया है, साथ ही डेयरी, कृषि, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे संवेदनशील सेक्टर को सुरक्षा देना जारी रखा है।बैंक ऑफ़ बड़ौदा रिसर्च के अनुसार, इस एग्रीमेंट से भारत की एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धात्मकता मज़बूत होने की उम्मीद है, खासकर MSME और ज़्यादा लेबर वाले उद्योगों के लिए, साथ ही अगले पांच सालों में UK के साथ बड़े ट्रेड सरप्लस को बढ़ावा मिलेगा।और पढ़ें :- कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई धीमी

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