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कमजोर मानसून से खरीफ फसलों पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई धीमी

बारिश की कमी से कई राज्यों में खरीफ फसल पर संकट, महाराष्ट्र में बुआई घटी, गुजरात-तेलंगाना के किसान चिंतितदेश के कई राज्यों में मानसून की सुस्त रफ्तार और लंबे ड्राई स्पेल ने खरीफ फसलों पर संकट खड़ा कर दिया है। तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों को कपास, सोयाबीन, मूंगफली और अन्य खरीफ फसलों के नुकसान की चिंता सताने लगी है। लगातार बारिश नहीं होने से खेतों में नमी तेजी से घट रही है, जिससे फसलों की बढ़वार प्रभावित हो रही है और किसानों की लागत बढ़ने का खतरा भी बढ़ गया है। तेलंगाना के आदिलाबाद जिले में किसानों का कहना है कि मानसून देर से पहुंचने और जुलाई में लंबे समय तक बारिश नहीं होने से कपास, सोयाबीन और लाल चने की फसलों की ग्रोथ रुक गई है। हल्की बूंदाबांदी होने के बावजूद खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई है। जैनद मंडल के अडा गांव के किसान मोरा किष्टू ने बताया कि जून के आखिर में शुरुआती बारिश के बाद उन्होंने 20 एकड़ में कपास की बुआई की थी, लेकिन अब अच्छी पैदावार के लिए समय पर बारिश बेहद जरूरी है। जिले में इस खरीफ सीजन में करीब 4.25 लाख एकड़ में कपास की खेती हुई है, लेकिन सूखे जैसे हालात से किसानों की चिंता बढ़ गई है।महाराष्ट्र में भी अल नीनो के असर और कमजोर मानसून के कारण खरीफ बुआई की रफ्तार धीमी पड़ गई है। कृषि विभाग के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक राज्य के 144.36 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में केवल 86.92 लाख हेक्टेयर यानी 60 प्रतिशत क्षेत्र में ही बुआई हो सकी है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 84 प्रतिशत था। कई इलाकों में बारिश की कमी से किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ रही है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। राज्य में सबसे अधिक बुआई सोयाबीन और कपास की हुई है, जबकि मराठवाड़ा, विदर्भ और कोंकण सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। गुजरात के भावनगर जिले के जेसर और आसपास के गांवों में भी पिछले 15 से 20 दिनों से पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। शुरुआती अच्छी बारिश के बाद किसानों ने कपास और मूंगफली की बुआई पूरी कर ली थी, लेकिन अब खेतों में नमी की कमी से पौधे सूखने लगे हैं। जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा नहीं है, वे सबसे अधिक प्रभावित हैं। किसानों का कहना है कि यदि अगले चार-पांच दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कपास और मूंगफली की फसलों को भारी नुकसान हो सकता है। तीनों राज्यों के किसान अब समय पर अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि आने वाले दिनों की वर्षा ही खरीफ फसलों की स्थिति तय करेगी।और पढ़ें :- अल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह

अल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को कम पानी वाली फसलें उगाने की सलाह

एल नीनो का असर: करीमनगर में किसानों को धान छोड़ कम पानी वाली फसलें अपनाने की सलाहकरीमनगर: तेलंगाना के करीमनगर जिले में कमजोर मानसून और एल नीनो के प्रभाव के कारण कृषि विभाग ने खरीफ सीजन में किसानों को धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों की जगह कम पानी वाली फसलें अपनाने की सलाह दी है। सिंचाई के लिए पानी की कमी को देखते हुए जिला प्रशासन ने कंटिंजेंसी प्लान लागू किया है, ताकि किसानों का नुकसान कम किया जा सके। जिला कृषि अधिकारी जे. भाग्यलक्ष्मी ने बताया कि विभागीय सर्वे में सिंचाई की गंभीर कमी सामने आई है। किसानों से अरहर, मूंग, लोबिया और सूरजमुखी जैसी कम पानी में तैयार होने वाली फसलें बोने की अपील की गई है। सिंचाई विभाग के अनुसार लोअर मनेयर डैम में फिलहाल 5.568 टीएमसीएफटी पानी उपलब्ध है, जबकि इसकी कुल क्षमता 24.034 टीएमसीएफटी है। यह जल भंडार अगले 90 दिनों तक मुख्य रूप से पेयजल जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।करीमनगर में लगभग 1.57 लाख एकड़ कृषि भूमि होने के बावजूद पानी की कमी के चलते 15 जुलाई तक बड़े क्षेत्र में बुआई प्रभावित रही। जिला कलेक्टर चित्रा मिश्रा ने कृषि और सिंचाई विभाग के अधिकारियों को वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने और आपातकालीन कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, राजन्ना-सिरसिला जिले में भी एल नीनो का असर साफ दिखाई दे रहा है। सामान्य 2.45 लाख एकड़ के मुकाबले अब तक केवल 93 हजार एकड़ में ही बुआई हो सकी है, जिससे जिले की कृषि गतिविधियां करीब 40 प्रतिशत प्रभावित हुई हैं।और पढ़ें :- बारिश की कमी से पैठण-पाचोड़ में खरीफ फसलों पर संकट

बारिश की कमी से पैठण-पाचोड़ में खरीफ फसलों पर संकट

बारिश की कमी से पाचोड-पैठण में खरीफ फसलें संकट मेंपाचोड (महाराष्ट्र): पिछले तीन सप्ताह से बारिश नहीं होने के कारण पाचोड और पैठण तालुका में खरीफ की फसलें गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। पर्याप्त वर्षा के अभाव में फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं। छोटे-छोटे पौधे तेज़ धूप और गर्मी के कारण झुलस रहे हैं, जिससे किसानों के सामने दोबारा बुवाई का संकट खड़ा हो गया है।करीब दस वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस वर्ष मानसून लगभग एक महीने की देरी से सक्रिय हुआ, जिसके कारण खेती योग्य भूमि के केवल आधे हिस्से में ही खरीफ की बुवाई हो सकी। किसानों ने उधार लेकर या अपनी सीमित बचत का उपयोग कर बीजों की व्यवस्था की और पैठण तालुका के दस राजस्व मंडलों में लगभग 63,000 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई पूरी की। शुरुआती बारिश के बाद बीजों का अंकुरण अच्छा हुआ और फसलों की बढ़वार भी संतोषजनक रही। हालांकि, जैसे ही किसानों ने निराई-गुड़ाई जैसे कृषि कार्य पूरे किए, बारिश अचानक थम गई।लगातार बारिश नहीं होने से मिट्टी की नमी तेजी से कम हो रही है। इसका असर कपास, बाजरा और मूंग जैसी खरीफ फसलों पर साफ दिखाई दे रहा है। नमी की कमी के कारण फसलों पर कीटों का प्रकोप भी बढ़ गया है और खेतों में पौधे मुरझाने लगे हैं।फसलों को बचाने के लिए किसान हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। कुछ किसान छोटे बर्तनों से पौधों को हाथ से पानी दे रहे हैं, जबकि अन्य किसान अपने कुओं में बचे सीमित पानी का उपयोग ड्रिप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से कर रहे हैं। यदि जल्द ही अच्छी बारिश नहीं हुई, तो किसानों को दोबारा बुवाई करने की नौबत आ सकती है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने की आशंका है।और पढ़ें :- CCI ने 2025-26 सीजन में 85.04 लाख कपास गांठें बेचीं, राज्यवार विवरण

कर्नाटक में कमजोर मानसून से खरीफ फसलों और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा संकट

कर्नाटक की खेती को मानसून की अनिश्चितता से बचाने की चुनौतीमानसून में आई भारी कमी ने कर्नाटक के किसानों के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसका असर राष्ट्रीय स्तर पर भी महसूस किया जा सकता है। जुलाई के पहले सप्ताह तक खरीफ़ फसलों की बुआई निर्धारित लक्ष्य के केवल एक-तिहाई हिस्से तक ही पहुंच पाई थी। जून से अक्टूबर तक चलने वाले इस कृषि मौसम में किसान आमतौर पर धान, मक्का, रागी, ज्वार और बाजरा जैसे अनाज; अरहर और अन्य दालें; मूंगफली, सूरजमुखी, सोयाबीन और नाइजर बीज जैसे तिलहन; तथा कपास, गन्ना, तंबाकू और लाल मिर्च जैसी नकदी फसलें उगाते हैं।इन फसलों का उत्पादन काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। राजस्थान के बाद कर्नाटक में देश का सबसे बड़ा शुष्क कृषि क्षेत्र है और राज्य की लगभग 84.79 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बारिश पर आधारित है। इस कारण वर्षा में किसी भी तरह की कमी सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है। इस वर्ष अल-नीनो प्रभाव के कारण वर्षा में भारी कमी दर्ज की गई है। मलनाड क्षेत्र, तटीय कर्नाटक, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और दक्षिणी आंतरिक कर्नाटक में वर्षा की कमी क्रमशः 34 प्रतिशत, 30 प्रतिशत, 24 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।इस संकट का प्रभाव केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य देश में मोटे अनाज के प्रमुख उत्पादकों में शामिल है और अरहर दाल की खेती के लिए सबसे अधिक क्षेत्रफल भी यहीं है। इसलिए कर्नाटक के कृषि उत्पादन में बड़ी गिरावट का असर देशभर में खाद्यान्न आपूर्ति और कीमतों पर पड़ सकता है।इस प्राकृतिक संकट के साथ मानवीय चुनौती भी बढ़ रही है। कर्नाटक की लगभग 1.37 करोड़ आबादी, यानी राज्य के हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति की आजीविका कृषि पर निर्भर है। ऐसे हालात में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से स्थिति का आकलन करने और राहत उपायों के लिए केंद्रीय टीम भेजने का आग्रह किया है।केंद्र सरकार से मिलने वाली सहायता आवश्यक है, लेकिन कर्नाटक को इस संकट से एक दीर्घकालिक सबक भी लेना होगा। राज्य की खेती लंबे समय से मानसून की अनिश्चितता पर निर्भर रही है। अब आवश्यकता है कि सरकार केवल शहरी विकास, विशेषकर बड़े शहरों की परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कृषि क्षेत्र की जल सुरक्षा को प्राथमिकता दे।इसके लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, जल संरक्षण उपायों को मजबूत करना, सूखा-सहने वाली फसलों को बढ़ावा देना, नहर नेटवर्क का विस्तार, भूजल पुनर्भरण में सुधार और आधुनिक सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों का व्यापक इस्तेमाल जरूरी है। लक्ष्य केवल मौजूदा संकट से निपटना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसी कृषि व्यवस्था तैयार करना होना चाहिए जो किसानों को मानसून की अनिश्चितताओं से दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान कर सके।कृषि को प्राकृतिक अनिश्चितताओं का शिकार बनने से रोकना केवल कर्नाटक की जरूरत नहीं है, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।और पढ़ें :- गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा लगभग 15% घटा

गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा लगभग 15% घटा

गुजरात और महाराष्ट्र में धीमी बुआई से भारत में कपास का रकबा करीब 15% घटाभारत में 2026 खरीफ सीजन के शुरुआती चरण में कपास की बुआई पिछले साल की तुलना में काफी पीछे चल रही है। मॉनसून में देरी और क्षेत्रीय मौसम परिस्थितियों के कारण प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई की गति प्रभावित हुई है। 10 जुलाई 2026 तक देश में 79.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुआई दर्ज की गई, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 93.95 लाख हेक्टेयर था। इस तरह कपास का रकबा 14.41 लाख हेक्टेयर या करीब 15.3% कम रहा है।बुआई में सबसे बड़ी गिरावट गुजरात और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में देखी गई है। महाराष्ट्र में इस सीजन अब तक 30.07 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुआई हुई है, जो पिछले वर्ष के 35.46 लाख हेक्टेयर से 5.39 लाख हेक्टेयर कम है। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे प्रमुख कपास क्षेत्रों में देर से हुई बारिश के कारण किसानों की बुआई गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।गुजरात में गिरावट और अधिक रही। राज्य में कपास का रकबा पिछले साल के 17.11 लाख हेक्टेयर से घटकर 9.32 लाख हेक्टेयर रह गया, यानी 7.79 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई। गुजरात और महाराष्ट्र मिलकर देश में कपास के कुल रकबे में आई लगभग 13.2 लाख हेक्टेयर की कमी के लिए जिम्मेदार हैं।इसके विपरीत, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कपास की बुआई में सुधार देखने को मिला है। तेलंगाना में कपास का रकबा पिछले साल की तुलना में 1.96 लाख हेक्टेयर बढ़कर 15.96 लाख हेक्टेयर हो गया है। अच्छी बारिश और समय पर कृषि कार्य शुरू होने से राज्य में बुआई को गति मिली है। आंध्र प्रदेश में भी कपास का रकबा 0.78 लाख हेक्टेयर बढ़कर 2.40 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है।अन्य प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में बुआई पिछले साल के स्तर से नीचे बनी हुई है। राजस्थान में 1.28 लाख हेक्टेयर, हरियाणा में 0.90 लाख हेक्टेयर, ओडिशा में 0.66 लाख हेक्टेयर, कर्नाटक में 0.59 लाख हेक्टेयर और पंजाब में 0.43 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। मध्य प्रदेश में कपास का रकबा लगभग स्थिर रहा, जबकि तमिलनाडु में भी पिछले वर्ष के मुकाबले कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।2026 खरीफ सीजन के लिए कपास का राष्ट्रीय लक्ष्य 116.12 लाख हेक्टेयर रखा गया है, लेकिन 10 जुलाई तक केवल 79.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुआई हो पाई है। हालांकि कपास की बुआई जुलाई और अगस्त की शुरुआत तक जारी रहती है, इसलिए आने वाले हफ्तों में बेहतर मॉनसून से रकबे में सुधार की संभावना बनी हुई है।यदि बुआई में कमी बनी रहती है, तो आगामी विपणन सीजन में कच्चे कपास की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका असर घरेलू टेक्सटाइल उद्योग, कपास निर्यात और फाइबर कीमतों पर पड़ सकता है। वैश्विक कपास बाजार भी मौसम संबंधी आपूर्ति जोखिमों को लेकर संवेदनशील बने हुए हैं, ऐसे में भारत की उत्पादन स्थिति पर बाजार की नजर बनी रहेगी।और पढ़ें :- गुजरात–महाराष्ट्र में बारिश की देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों को दोबारा बुवाई का डर

गुजरात–महाराष्ट्र में बारिश की देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों को दोबारा बुवाई का डर

गुजरात–महाराष्ट्र: बारिश में देरी से कपास की फसल पर संकट, किसानों पर दोबारा बुवाई का खतरागुजरात के छोटाउदेपुर जिले के बोदेली तालुका के सेगवा-सिमली गांव और महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शेवगांव तालुका में समय पर बारिश नहीं होने से कपास उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ गई है। शुरुआती बारिश के बाद किसानों ने कपास की बुवाई पूरी कर ली थी और खेतों में पौधे निकल आए थे। लेकिन पिछले कई दिनों से बारिश नहीं होने के कारण मिट्टी की नमी कम होने लगी है, जिससे फसल की बढ़वार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।दोनों क्षेत्रों में कपास प्रमुख खरीफ फसल है और बड़ी संख्या में किसान इस पर निर्भर हैं। किसानों ने बीज, उर्वरक, मजदूरी और खेत की तैयारी पर हजारों रुपये खर्च किए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि मानसून समय पर आगे बढ़ेगा, लेकिन बारिश रुकने से उनकी चिंता बढ़ गई है। लगातार सूखे मौसम के कारण कई खेतों में कपास के पौधों की वृद्धि धीमी पड़ रही है। कुछ स्थानों पर पौधों के मुरझाने और सूखने की स्थिति भी देखने को मिल रही है।महाराष्ट्र के शेवगांव तालुका में पिछले 15 दिनों से बारिश नहीं होने के कारण किसानों को दोबारा बुवाई का डर सताने लगा है। किसान यलप्पा कुसलकर ने बताया कि उन्होंने तीन एकड़ में कपास की खेती पर काफी खर्च किया है, लेकिन बारिश के अभाव में फसल प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो किसानों को दोबारा बीज और अन्य कृषि सामग्री खरीदने पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा।गुजरात के सेगवा-सिमली और आसपास के क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि कपास के शुरुआती विकास के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है। बारिश में और देरी होने पर पौधों की वृद्धि रुक सकती है और कुछ खेतों में दोबारा बुवाई की स्थिति बन सकती है। इससे किसानों की लागत बढ़ने के साथ उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि वे खेतों की नियमित निगरानी करें और मौसम की स्थिति के अनुसार कृषि प्रबंधन अपनाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल्द पर्याप्त बारिश हो जाती है, तो कपास की फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है। लेकिन बारिश में अधिक देरी होने पर उत्पादन में कमी और आर्थिक नुकसान की संभावना बढ़ सकती है।फिलहाल गुजरात और महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसान अच्छी मानसूनी बारिश का इंतजार कर रहे हैं, ताकि फसल को आवश्यक नमी मिल सके और उनकी मेहनत सफल हो सके।और पढ़ें :- महाराष्ट्र के दिग्रस स्पिनिंग मिल से चीन को पहली कॉटन यार्न खेप रवाना, विदर्भ को वैश्विक पहचान

महाराष्ट्र के दिग्रस स्पिनिंग मिल से चीन को पहली कॉटन यार्न खेप रवाना, विदर्भ को वैश्विक पहचान

महाराष्ट्र: डिग्रस स्पिनिंग मिल ने चीन को भेजा पहला कॉटन यार्न, विदर्भ की कपास उद्योग को मिली वैश्विक पहचानमहाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की 'रामदास अठावले बैकवर्ड क्लास कॉटन ग्रोअर्स कोऑपरेटिव स्पिनिंग मिल' ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश करते हुए चीन को कॉटन यार्न का पहला निर्यात किया है। डिग्रस स्थित इस सहकारी स्पिनिंग मिल में तैयार उच्च गुणवत्ता वाले यार्न को चीनी बाजार में स्वीकृति मिलने के बाद पहला कंटेनर समुद्री मार्ग से रवाना किया गया। इसे विदर्भ की कपास प्रसंस्करण उद्योग और स्थानीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।वर्ष 2019 में पंजीकृत इस सहकारी स्पिनिंग मिल ने 2025 में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया। कम समय में ही इसने उच्च गुणवत्ता वाले यार्न के उत्पादन के दम पर राज्य की प्रमुख सहकारी स्पिनिंग मिलों में अपनी पहचान बना ली है। संस्था का दावा है कि पिछले एक दशक में पंजीकृत सहकारी स्पिनिंग मिलों में यह ऐसी पहली इकाई है जिसने सफलतापूर्वक उत्पादन शुरू कर बाजार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।निर्यात से पहले चीन के विशेषज्ञों की एक टीम ने मिल में तैयार यार्न की गुणवत्ता का विस्तृत तकनीकी परीक्षण किया। सभी अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरने के बाद ही चीन के बाजार में इसके निर्यात को मंजूरी मिली। मिल के संस्थापक-अध्यक्ष मिलिंद मानकर ने बताया कि डिग्रस में तैयार यार्न को अब अन्य देशों से भी मांग मिलने लगी है, जिससे भविष्य में निर्यात बढ़ने की संभावना है।मिल के अध्यक्ष महेंद्र मानकर के अनुसार, आधुनिक स्वचालित मशीनरी, अनुभवी तकनीकी टीम, कुशल प्रबंधन और कर्मचारियों की मेहनत के कारण अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता का यार्न तैयार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी जैसी चुनौतियों के बावजूद परियोजना को सफलतापूर्वक पूरा किया गया और उत्पादन शुरू किया गया।मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले और संरक्षक मंत्री संजय राठौड़ के सहयोग से यह परियोजना शुरू हो सकी। पहले निर्यात कंटेनर को रवाना करने से पहले मिल परिसर में विधिवत पूजा-अर्चना की गई, जिसमें निदेशक मंडल, अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।मिल ने पिछले 18 महीनों में लगभग 5,500 टन कॉटन यार्न का उत्पादन किया है। इसकी स्वीकृत क्षमता 25,000 स्पिंडल की है, जिनमें से वर्तमान में 16,500 स्पिंडल संचालित हैं। मिल में प्रतिदिन 10 से 12 टन यार्न तैयार किया जा रहा है। प्रबंधन का मानना है कि चीन को पहला निर्यात भविष्य में नए अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए रास्ता खोलेगा और इससे विदर्भ के कपास उत्पादक किसानों के साथ-साथ क्षेत्र के वस्त्र उद्योग को भी दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।और पढ़ें :- CCI ने कॉटन कैंडी के दाम ₹800 बढ़ाए, साप्ताहिक नीलामी 3.18 लाख गांठ पर पहुंची

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