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देरी से आए मानसून के कारण महाराष्ट्र में कपास का रकबा 10% घटा

मानसून में देरी से महाराष्ट्र में कपास का रकबा 10% घटामहाराष्ट्र: मानसून में देरी और शुरुआती बारिश की कमी का असर महाराष्ट्र में कपास की बुवाई पर पड़ा है। देश के सबसे बड़े कपास उत्पादक राज्य में इस खरीफ सीजन कपास का रकबा करीब 10% घटकर 38.4 लाख हेक्टेयर रह गया है। पिछले पांच वर्षों में राज्य में कपास की औसत बुवाई 42.5 लाख हेक्टेयर रही है। इस लिहाज से करीब 4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कमी आई है।भारत के कुल कपास क्षेत्र में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी करीब 38% है। कपास राज्य की प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है और कुल 1.4 करोड़ हेक्टेयर खरीफ क्षेत्र में इसका हिस्सा करीब 30% है। ऐसे में बुवाई क्षेत्र में कमी से उत्पादन और पैदावार को लेकर चिंता बढ़ गई है।मानसून में देरी का सबसे अधिक असर नासिक मंडल में पड़ा है। जलगांव, धुले, नंदुरबार और नासिक जिलों वाले इस मंडल में कपास की बुवाई 9.30 लाख हेक्टेयर के औसत क्षेत्र के मुकाबले घटकर 7.48 लाख हेक्टेयर रह गई है। यानी करीब 1.82 लाख हेक्टेयर की कमी आई है, जो 24% से अधिक है। जलगांव में भी कपास का रकबा 5.5 लाख हेक्टेयर के औसत से घटकर 4.3 लाख हेक्टेयर रह गया है।छत्रपति संभाजीनगर मंडल में भी कपास की बुवाई में करीब 22% की गिरावट दर्ज की गई है। छत्रपति संभाजीनगर, जालना और बीड जिलों वाले इस मंडल में औसत 10.3 लाख हेक्टेयर के मुकाबले करीब 8 लाख हेक्टेयर में कपास बोई गई है।इसके विपरीत, अमरावती मंडल में कपास की बुवाई सामान्य रही। बुलढाणा, अकोला, वाशिम, अमरावती और यवतमाल जिलों में औसत 10.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के बराबर ही इस वर्ष कपास बोई गई है। कृषि अधिकारियों के अनुसार, इन क्षेत्रों में बुवाई के दौरान बारिश का वितरण बेहतर रहा।हालांकि, अब कई कपास उत्पादक क्षेत्रों में पिछले दो सप्ताह से बारिश नहीं होने के कारण किसान फसल की बढ़वार को लेकर चिंतित हैं। धुले के किसान लक्ष्मण पाटिल ने कहा कि कपास की फसल को अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश की जरूरत है। बारिश नहीं होने पर फसल प्रभावित होने के साथ पैदावार में भी गिरावट आ सकती है।और पढ़ें - टिंटुई में कपास सीजन की शुरुआत ₹2,100 पर

टिंटुई में कपास सीजन की शुरुआत ₹2,100 पर

कपास सीजन की धमाकेदार शुरुआत! टिंटोई में ₹2,100 प्रति मन बिका कपासमोडासा के टिंटोई सबयार्ड में नए कपास सीजन की शुरुआत हो गई है। मानसून के बाद तैयार हुई कपास की पहली आवक के साथ बाजार में कारोबार शुरू हुआ। पहले दिन पब्लिक ऑक्शन में कपास की शुरुआती बोली ₹1,111 प्रति मन से शुरू हुई, जबकि अंत में गुरुकृपा व्यापारियों ने सबसे ऊंची बोली लगाकर कपास ₹2,100 प्रति मन के भाव पर खरीदी।नए सीजन के पहले ही दिन कपास के ऊंचे भाव मिलने से किसानों में खुशी का माहौल रहा। ऑक्शन के दौरान व्यापारियों में भी नई कपास की खरीद को लेकर उत्साह देखा गया।क्षेत्र में इस सीजन किसानों ने 20 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की बुवाई की है। ऐसे में आने वाले दिनों में टिंटोई सबयार्ड में कपास की आवक बढ़ने की उम्मीद है।सीजन की पहली खरीद के अवसर पर मोडासा यार्ड के चेयरमैन पंकजभाई पटेल ने टिंटोई सबयार्ड के कर्मचारियों, व्यापारियों और किसानों को बधाई दी और नए सीजन के सफल कारोबार की शुभकामनाएं दीं।और पढ़ें :- बारवानी कपास को मिलेगी गुणवत्ता पहचान

बारवानी कपास को मिलेगी गुणवत्ता पहचान

बड़वानी के कपास को मिलेगी गुणवत्ता की पहचान, हर बेल पर ₹500 तक इंसेंटिवखेत से जिनिंग तक गुणवत्ता मानकों से जोड़ी जाएगी पूरी प्रक्रिया, जिले में कॉटन टेस्टिंग लैब स्थापित करने की तैयारीबड़वानी जिले के कपास को देश-विदेश के बाजार में विशिष्ट पहचान दिलाने के लिए अब खेत से लेकर जिनिंग तक पूरी प्रक्रिया को गुणवत्ता मानकों से जोड़ने की तैयारी की जा रही है। कस्तूरी कॉटन भारत मिशन के तहत जिले में कॉटन टेस्टिंग लैब स्थापित करने की पहल की जा रही है। इससे स्थानीय स्तर पर ही कपास की गुणवत्ता का वैज्ञानिक परीक्षण संभव हो सकेगा।कपास की गुणवत्ता में सुधार के लिए जिनिंग इकाइयों में पोस्ट-क्लीनिंग मशीन लगाने का भी प्रावधान किया गया है। वहीं, गुणवत्तायुक्त कपास को कस्तूरी कॉटन के रूप में बढ़ावा देने पर प्रत्येक बेल पर ₹500 तक का इंसेंटिव दिए जाने की जानकारी दी गई है। इससे गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किसानों और जिनिंग इकाइयों को प्रोत्साहन मिलेगा।इस संबंध में भारतीय कपास निगम (सीसीआई) के सीएमडी ललित कुमार गुप्ता ने गुरुवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कलेक्टर एवं जिले के अधिकारियों के साथ जिनिंग और स्पिनिंग उद्योग से जुड़े व्यापारियों से चर्चा की। बैठक में बड़वानी के कपास को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में विशिष्ट पहचान दिलाने के लिए गुणवत्ता, स्वच्छता और ट्रेसबिलिटी पर चर्चा हुई।मिशन के तहत किसानों को कपास की पिकिंग के समय से ही साफ-सफाई का ध्यान रखने के लिए जागरूक किया जाएगा। कपास में मिट्टी, पत्तियां, कचरा अथवा अन्य बाहरी सामग्री की मिलावट रोकने पर विशेष जोर रहेगा। इसके बाद भंडारण, परिवहन और जिनिंग के दौरान भी गुणवत्ता मानकों का पालन सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जाएगा।कलेक्टर जयति सिंह ने बताया कि इस दिशा में जिले में जागरूकता बढ़ाई जा रही है। जल्द ही इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए कपास की गुणवत्ता सुधारने और बड़वानी के कपास को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।और पढ़ें :- कॉटन यार्न के दाम 60% बढ़े.

कॉटन यार्न के दाम 60% बढ़े.

सूती धागे की कीमतें 60% बढ़ीं: भारतीय टेक्सटाइल इंडस्ट्री लागत के बढ़ते संकट का सामना कर रही हैभारत का टेक्सटाइल उद्योग लागत के बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है क्योंकि सूती धागे की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे देश के बढ़ते फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से मिलने वाले संभावित फायदों पर असर पड़ रहा है।अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के अनुसार, सूती धागे की कीमतें लगभग 60% बढ़कर ₹250 प्रति किलोग्राम से ₹400 प्रति किलोग्राम के आसपास पहुंच गई हैं। कपड़ों के निर्यातकों ने सरकार से धागे के निर्यात को नियंत्रित करने और घरेलू कीमतों को काबू में रखने के उपायों पर विचार करने का आग्रह किया है।उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि धागे की बढ़ती कीमतें और कपास की सीमित उपलब्धता टेक्सटाइल सेक्टर के लिए एक गंभीर चुनौती पैदा कर रही हैं। तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव कुमार दुरईस्वामी ने कहा कि भारत को लगभग 10 लाख गांठों (बेल्स) की कमी का सामना करना पड़ रहा है और उन्होंने ड्यूटी-फ्री कपास आयात को बढ़ाने और घरेलू उत्पादन में वृद्धि करने की मांग की।सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि 2020-21 में 352.48 लाख गांठों की तुलना में 2025-26 में कपास का उत्पादन घटकर 290.91 लाख गांठें रह गया। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि कम उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियां धागे की कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बन रही हैं।धागे की बढ़ती लागत टेक्सटाइल वैल्यू चेन में मुनाफे (मार्जिन) को कम कर रही है। प्राइमस पार्टनर्स के कनिष्क माहेश्वरी ने कहा कि तिरुपुर के निर्यातकों का अनुमान है कि उत्पादन लागत में 15% तक की वृद्धि हुई है। इनपुट लागत बढ़ने से कपड़े और तैयार कपड़ों की लागत भी बढ़ रही है, जबकि निर्यातकों को इस पूरी बढ़ोतरी का बोझ वैश्विक खरीदारों पर डालने में कठिनाई हो रही है।उद्योग के विशेषज्ञों का मानना है कि FTA बाजार तक अच्छी पहुंच प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इनपुट लागत अधिक होने से भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता कम हो सकती है। उन्होंने कच्चे माल की भरोसेमंद आपूर्ति, कपास आयात में अधिक लचीलापन, बेहतर उत्पादकता, तकनीक को अपनाने और सप्लाई-चेन की दक्षता बढ़ाने की मांग की।विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि FTA के अवसरों को लगातार निर्यात वृद्धि में बदलने के लिए भारत को पूरी टेक्सटाइल वैल्यू चेन—कपास और धागे से लेकर तैयार कपड़ों तक—को मजबूत करना होगा।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 24 पैसे की कमजोरी के साथ 95.68 पर खुला।

जेफरीज को भारतीय टेक्सटाइल सेक्टर में लंबी ग्रोथ की उम्मीद

भारत के टेक्सटाइल सेक्टर में लंबे ग्रोथ साइकल की उम्मीद: जेफ़रीज़भारत का टेक्सटाइल सेक्टर आने वाले कई वर्षों तक चलने वाले ग्रोथ साइकल में प्रवेश कर सकता है। ग्लोबल ब्रांड्स की चीन से बाहर सोर्सिंग बढ़ाने की रणनीति और सप्लाई चेन में विविधता से भारत के लिए एक्सपोर्ट और मार्केट शेयर बढ़ाने के बड़े अवसर बन रहे हैं। हालांकि, जेफ़रीज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मैन-मेड फाइबर (MMF) की ओर बदलाव अब भी सेक्टर के लिए एक प्रमुख संरचनात्मक चुनौती बना हुआ है।रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल टेक्सटाइल और अपैरल मार्केट का आकार 900 अरब डॉलर से अधिक है, जिसमें अपैरल की हिस्सेदारी करीब 60% है। भारत को फाइबर-टू-फैशन इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम, करीब 37 अरब डॉलर के एक्सपोर्ट बेस, कच्चे माल की उपलब्धता, कुशल श्रमबल और सरकार की सहायक नीतियों से फायदा मिल सकता है।जेफ़रीज़ के अनुसार, प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार और ग्लोबल सप्लाई चेन के पुनर्गठन से भारत के लिए एक्सपोर्ट बढ़ाने और मार्केट शेयर हासिल करने का कई वर्षों तक चलने वाला अवसर मौजूद है। हालांकि, भारत का एक्सपोर्ट मिक्स अभी भी कॉटन-आधारित उत्पादों पर अधिक निर्भर है, जबकि वैश्विक मांग तेजी से MMF अपैरल, स्पोर्ट्सवियर और एथलीज़र की ओर बढ़ रही है।होम टेक्सटाइल को भी एक आकर्षक ग्रोथ सेगमेंट माना जा रहा है। यह ग्लोबल टेक्सटाइल और अपैरल ट्रेड का करीब 7-10% हिस्सा है। भारत की अमेरिका में बेड लिनन और तौलिया जैसी प्रमुख होम टेक्सटाइल कैटेगरी में करीब 45-60% हिस्सेदारी है, जबकि यूके और यूरोपीय संघ में इसकी हिस्सेदारी करीब 5-25% है। इससे इन बाजारों में आगे बढ़ने की पर्याप्त गुंजाइश है।फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) भी एक्सपोर्ट ग्रोथ को गति दे सकते हैं। जुलाई 2026 से लागू भारत-यूके FTA और 2027 से संभावित भारत-EU FTA करीब 220 अरब डॉलर के टेक्सटाइल और अपैरल इंपोर्ट मार्केट में भारत की टैरिफ पहुंच बेहतर कर सकते हैं।हालांकि, सीमित FTA कवरेज, अपेक्षाकृत अधिक लॉजिस्टिक्स और कंप्लायंस लागत, कम मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और MMF सेगमेंट में कमजोर मौजूदगी भारत की प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं।और पढ़ें :- गिर सोमनाथ में बारिश की देरी से किसान चिंतित

गिर सोमनाथ में बारिश की देरी से किसान चिंतित

गिर सोमनाथ में बारिश की देरी से किसानों की चिंता बढ़ी, मूंगफली-सोयाबीन-कपास क्रिटिकल स्टेज मेंगुजरात के गिर सोमनाथ जिले में मानसून में देरी से किसानों की चिंता बढ़ गई है। जिले में इस खरीफ सीजन में 1,47,323 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है, जो पिछले साल के लगभग बराबर है। फिलहाल मूंगफली, सोयाबीन और कपास उत्पादन के महत्वपूर्ण चरण में हैं, ऐसे में आने वाले दिनों की बारिश फसलों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।जिले में 91,479 हेक्टेयर में मूंगफली, 26,787 हेक्टेयर में सोयाबीन और 12,491 हेक्टेयर में कपास की बुवाई हुई है। करीब 11,103 हेक्टेयर में चारे की फसलें भी बोई गई हैं। मूंगफली इस समय दाना भरने, सोयाबीन दाना बनने और भरने, जबकि कपास फूल-कली बनने के चरण में है।कृषि विभाग के सहायक निदेशक जयदीप चौहान के अनुसार, जिले के अधिकांश क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा है और किसान फिलहाल भूजल से फसलों को पानी दे रहे हैं। इसलिए बारिश में देरी के बावजूद अभी तक फसलों की स्थिति खराब नहीं हुई है। हालांकि, लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर भूजल और सिंचाई स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है।विभाग के मुताबिक, अगले 8 से 10 दिनों में अच्छी बारिश होने पर बड़े नुकसान की संभावना कम है। किसानों को पानी का सीमित इस्तेमाल करने तथा ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाने की सलाह दी गई है। मिट्टी में नमी बनाए रखने के लिए खरपतवार नियंत्रण और मल्चिंग पर भी जोर दिया गया है। फूल आने और दाना भरने के चरण में सिंचाई को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है।कृषि विभाग ने नमी की कमी की स्थिति में 1–2% यूरिया या पोटैशियम नाइट्रेट (13:0:45) के घोल का स्प्रे करने और फसल पकने पर समय पर कटाई करने की सलाह दी है। फिलहाल किसान अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं।और पढ़ें :- डॉलर के मुकाबले रुपया 15 पैसे की कमजोरी के साथ 95.25 पर खुला।

कपास कीमतों में उतार-चढ़ाव से टेक्सटाइल उद्योग चिंतित

कॉटन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से टेक्सटाइल उद्योग चिंतितकॉटन और यार्न की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच तमिलनाडु की टेक्सटाइल मिलें और गारमेंट यूनिट्स कॉटन की उपलब्धता बेहतर करने के उपाय चाहती हैं।कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि दुनियाभर में कॉटन यार्न की मांग में तेजी इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रमुख कारणों में से एक है।उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यार्न की मांग पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बेहतर हुई है। 2023-24 से कॉटन यार्न की मांग कमजोर थी, लेकिन पिछले दिसंबर से टेक्सटाइल वैल्यू चेन में टेक्सटाइल उत्पादों की मांग बढ़ने लगी।चीन और बांग्लादेश से यार्न की मांग बढ़ी है, जबकि घरेलू गारमेंट बाजार में भी मांग में सुधार हो रहा है। इससे यार्न का बाजार बेहतर हुआ है। होजरी यार्न का निर्यात मुख्य रूप से गुजरात की मिलों से होता है, जबकि तमिलनाडु की मिलों की इसमें हिस्सेदारी कम है।कॉटन फ्यूचर्स की कीमत एक समय 92 सेंट प्रति पाउंड तक पहुंच गई थी, जो अब करीब 86 सेंट है। चंद्रन के अनुसार, पिछले एक साल में साफ कॉटन की लैंडेड कीमत करीब ₹70 बढ़ी है, जबकि यार्न की कीमत में लगभग ₹95 प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई है।इस बीच, तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने केंद्र और राज्य सरकारों से कॉटन के निर्यात पर रोक लगाने की अपील की है। एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि जनवरी से कुछ बड़ी स्पिनिंग मिलों और कारोबारियों ने कॉटन की सप्लाई कृत्रिम रूप से सीमित की है, जिससे यार्न की कीमतें बढ़ी हैं और छोटे व मध्यम उद्यमों पर दबाव बढ़ा है।एसोसिएशन के मुताबिक, देश में कॉटन की जरूरत करीब 350 लाख बेल है, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 290 लाख बेल है। सरकार ने कॉटन पर 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाई और करीब 62 लाख बेल कॉटन का आयात किया। इसके बावजूद कीमतों में बढ़ोतरी जारी है। एसोसिएशन ने इसे कृत्रिम बाजार हेरफेर का नतीजा बताया है और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।और पढ़ें :- रुपया 23 पैसे गिरकर 95.10 प्रति डॉलर पर बंद हुआ

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