Recent News

CITI-ICAC का कार्बन क्रेडिट समझौता

CITI, ICAC और Merago की साझेदारी से कपास किसानों को मिलेगा कार्बन क्रेडिट का लाभचेन्नई: भारतीय कपड़ा उद्योग परिसंघ (CITI) ने इंटरनेशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (ICAC) और टेक्नोलॉजी कंपनी Merago Inc. के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी का उद्देश्य पुनर्योजी (Regenerative) कृषि पद्धतियों पर आधारित कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं का विकास करना है। इस पहल से भारत में टिकाऊ कपास उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और कपास किसानों को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा।समझौते के तहत ICAC परियोजना का प्रमुख तकनीकी साझेदार होगा। संस्था किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, प्रशिक्षण, तकनीकी विशेषज्ञता और आवश्यक परामर्श प्रदान करेगी। वहीं, CITI–Cotton Development and Research Association (CITI-CDRA) तथा उससे जुड़े किसान मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और कार्बन अवशोषण (Carbon Sequestration) बढ़ाने के लिए पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को अपनाएंगे।परियोजना के अंतर्गत कृषि अवशेषों (बायोमास) से बायोचार और कम्पोस्ट तैयार कर उनका उपयोग कपास के खेतों में किया जाएगा। इन तकनीकों से मिट्टी की उर्वरता और जैविक गुणवत्ता में सुधार होगा, कार्बन भंडारण बढ़ेगा तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, दीर्घकाल में कपास की उत्पादकता बढ़ाने और खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में भी यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।Merago Inc. परियोजना के क्रियान्वयन के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराएगी तथा कार्बन एसेट मैनेजमेंट की जिम्मेदारी संभालेगी। दूसरी ओर, CITI-CDRA किसानों को परियोजना से जोड़ने, प्रशिक्षण देने और जमीनी स्तर पर इसके प्रभावी कार्यान्वयन का नेतृत्व करेगा।परियोजना के तहत उत्पन्न कार्बन क्रेडिट का विकास, सत्यापन (Verification) और हस्तांतरण पेरिस समझौते के अनुच्छेद-6 (Article 6), भारत के लागू कानूनों तथा कार्बन बाजार से संबंधित नियामकीय प्रावधानों के अनुरूप किया जाएगा। सत्यापित उत्सर्जन में कमी और कार्बन हटाने से जुड़े सभी रिकॉर्ड राष्ट्रीय कार्बन रजिस्ट्री में दर्ज किए जाएंगे।नियामकीय स्वीकृतियां मिलने के बाद सत्यापित कार्बन हटाने के एक निर्धारित हिस्से को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजारों में हस्तांतरण योग्य (Transferable) कार्बन क्रेडिट के रूप में प्रमाणित किया जाएगा। Merago Inc. इन कार्बन क्रेडिट के व्यावसायीकरण का प्रबंधन करेगी, जबकि पूर्व निर्धारित राजस्व-साझाकरण व्यवस्था के अनुसार प्राप्त आय CITI, ICAC और परियोजना में भाग लेने वाले किसानों के बीच वितरित की जाएगी।विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल किसानों के लिए आय का एक नया स्रोत विकसित कर सकती है। साथ ही, इससे भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा मिलेगा, मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा और वैश्विक स्तर पर टिकाऊ कपास उत्पादन में भारत की स्थिति और मजबूत होगी। यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो भविष्य में इसे अन्य कपास उत्पादक राज्यों में भी व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है, जिससे अधिक संख्या में किसानों को कार्बन बाजार से जुड़ने और अतिरिक्त आय अर्जित करने का अवसर मिलेगा।और पढ़ें :- भारत-यूके FTA से टेक्सटाइल को बढ़त

भारत-यूके FTA से टेक्सटाइल को बढ़त

UK-India FTA से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को $1 अरब तक के अतिरिक्त निर्यात का अवसर: Ind-Raनई दिल्ली: इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) ने कहा है कि भारत-यूके मुक्त व्यापार समझौता (UK-India FTA)भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के लिए मध्यम और दीर्घकालिक अवधि में महत्वपूर्ण विकास का अवसर प्रदान कर सकता है। एजेंसी के अनुसार, इस समझौते से भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों के लिए लगभग 1 अरब डॉलर तक के अतिरिक्त निर्यात की संभावना बन सकती है, जिससे वैश्विक बाजार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और मजबूत होगी।Ind-Ra की रिपोर्ट के अनुसार, FTA से यूनाइटेड किंगडम के बाजार में भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और बाजार हिस्सेदारी में सुधार होगा। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारतीय कंपनियां उत्पादन क्षमता का विस्तार, लागत प्रबंधन, नियामकीय अनुपालन और वित्तीय अनुशासन को कितनी प्रभावी ढंग से लागू करती हैं।एजेंसी ने इस समझौते को भारतीय टेक्सटाइल निर्यातकों की क्रेडिट प्रोफाइल के लिए सकारात्मक बताया है। हालांकि, इसके लाभ चरणबद्ध तरीके से सामने आएंगे, क्योंकि निर्यात बढ़ाने के लिए उत्पादन क्षमता का विस्तार, खरीदारों की स्वीकृति, कार्यशील पूंजी (Working Capital) का कुशल प्रबंधन और गुणवत्ता एवं नियामकीय मानकों का पालन आवश्यक होगा।Ind-Ra में कॉर्पोरेट रेटिंग्स के निदेशक रोहित सदाका ने कहा कि बड़ी और एकीकृत टेक्सटाइल कंपनियां अपने मजबूत वित्तीय संसाधनों, स्थापित ग्राहक आधार और बड़े उत्पादन नेटवर्क के कारण इस अवसर का अधिक लाभ उठा सकेंगी। इसके विपरीत, यदि छोटी कंपनियां विस्तार के लिए अत्यधिक कर्ज लेती हैं, तो उन पर लेवरेज और लिक्विडिटी का दबाव बढ़ सकता है।यूनाइटेड किंगडम भारत का तीसरा सबसे बड़ा टेक्सटाइल निर्यात बाजार है, जहां भारत के कुल टेक्सटाइल निर्यात का लगभग 6.1% जाता है। वहीं, भारत में यूके से होने वाला टेक्सटाइल आयात घरेलू खपत का 1% से भी कम है। वर्तमान में यूके के टेक्सटाइल आयात बाजार में भारत की हिस्सेदारी 6.9% है। Ind-Ra का अनुमान है कि यदि यह हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 10% हो जाती है, तो भारतीय कंपनियों के लिए करीब 900 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त निर्यात अवसर पैदा हो सकता है।रिपोर्ट के अनुसार, 12% आयात शुल्क (टैरिफ) समाप्त होने से भारतीय परिधान और होम टेक्सटाइल उत्पादों की लागत प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय सुधार होगा। इससे भारतीय निर्यातकों को समय के साथ चीनी आपूर्तिकर्ताओं से बाजार हिस्सेदारी हासिल करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, कम उत्पादन लागत और बड़े पैमाने के कारण बांग्लादेश से प्रतिस्पर्धा चुनौतीपूर्ण बनी रहेगी।Ind-Ra का मानना है कि FTA से निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, लेकिन लाभप्रदता में तत्काल उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना सीमित है। यूके के खरीदार टैरिफ लाभ का कुछ हिस्सा कम कीमतों के रूप में मांग सकते हैं, जबकि ईंधन, बिजली, मालभाड़ा और शिपिंग लागत में वृद्धि निकट अवधि में मार्जिन पर दबाव बनाए रख सकती है। हालांकि, लंबी अवधि में निर्यात मात्रा बढ़ने, बेहतर क्षमता उपयोग और परिचालन दक्षता में सुधार से भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की लाभप्रदता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता दोनों मजबूत होने की उम्मीद है।और पढ़ें :- भारत-यूके FTA से टेक्सटाइल को बढ़त

कपास उत्पादकता पर सरकार का फोकस

सरकार ने कपास की रणनीति को प्रोडक्टिविटी पर केंद्रित किया, FY31 तक 755 kg/हेक्टेयर पैदावार का लक्ष्यनई दिल्ली: केंद्र सरकार ने अपनी कपास विकास रणनीति को फसल सुरक्षा से हटाकर प्रोडक्टिविटी बढ़ाने की ओर मोड़ दिया है। इसका मकसद घरेलू कपास उत्पादन को बढ़ाना और आयात पर भारत की बढ़ती निर्भरता को कम करना है। ₹5,659 करोड़ के 'कपास प्रोडक्टिविटी मिशन' (कपास क्रांति) के तहत, केंद्र सरकार का लक्ष्य कपास की औसत प्रोडक्टिविटी को FY26 में 428 kg प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर FY31 तक 755 kg प्रति हेक्टेयर करना है। इसमें हर साल कम से कम 50 kg प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी का लक्ष्य रखा गया है।कपड़ा मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से लागू किए जाने वाले इस मिशन में ज़्यादा घनत्व वाली खेती (high-density planting), ज़्यादा पैदावार देने वाले बीजों की किस्मों, वैज्ञानिक खेती के तरीकों और किसानों की ट्रेनिंग को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि हाल के वर्षों में कपास की फसलों को पिंक बॉलवर्म और व्हाइटफ्लाई जैसे कीटों से बचाने पर काफी प्रयास किए गए हैं, लेकिन अगले चरण में खेती की प्रोडक्टिविटी सुधारने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।भारत में कपास की खेती का रकबा दुनिया में सबसे ज़्यादा है, फिर भी इसकी औसत प्रोडक्टिविटी 833 kg प्रति हेक्टेयर के वैश्विक औसत से काफी कम है। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि हाल के वर्षों में कपास की पैदावार में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है, जिससे प्रोडक्टिविटी पर केंद्रित उपायों की ज़रूरत साफ दिखती है।यह नया जोर ऐसे समय में दिया जा रहा है जब घरेलू कपास उत्पादन लगातार घट रहा है और आयात बढ़ रहा है। कपास का उत्पादन FY23 में 33.66 मिलियन गांठों (bales) से घटकर FY26 में अनुमानित 29.1 मिलियन गांठें रह गया है, जबकि सालाना घरेलू खपत 32.8 मिलियन गांठें होने का अनुमान है। इससे सप्लाई में कमी आ रही है जिसे आयात के ज़रिए पूरा किया जा रहा है।इस अंतर को पाटने के लिए, सरकार का लक्ष्य FY31 तक कपास उत्पादन को 49.8 मिलियन गांठों तक बढ़ाना है, जबकि घरेलू खपत 45 मिलियन गांठों तक पहुंचने का अनुमान है। इस मिशन से देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों के लगभग 32 लाख कपास किसानों को फायदा होने की उम्मीद है।इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि भारत के टेक्सटाइल सेक्टर को मजबूत करने और 2030 तक टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में $100 बिलियन का सरकारी लक्ष्य हासिल करने के लिए कपास की प्रोडक्टिविटी में सुधार करना ज़रूरी है। ज़्यादा पैदावार, बेहतर क्वालिटी का कपास, कच्चे माल की प्रतिस्पर्धी कीमतें और कम मिलावट (contamination) का स्तर वैश्विक बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाएगा। यूनाइटेड किंगडम के साथ समझौतों और यूरोपीय संघ के साथ चल रही बातचीत से व्यापार के नए मौके बन रहे हैं। ऐसे में, ग्लोबल कॉटन और टेक्सटाइल व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने में बढ़ी हुई प्रोडक्टिविटी अहम भूमिका निभाएगी।और पढ़ें :- रुपया 46 पैसे की बढ़त के साथ 94.92 प्रति डॉलर पर खुला।

कपास में उन्नत तकनीक जरूरी

कॉटन में भारत की प्रतिस्पर्धा के लिए उन्नत तकनीक जरूरी: डॉ. परोदानई दिल्ली: भारत के कॉटन सेक्टर में बढ़ती आयात निर्भरता पर चिंता जताते हुए प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए उन्नत कृषि तकनीकों, बायोटेक्नोलॉजी और विज्ञान-आधारित नीतियों को बढ़ावा देना जरूरी है।कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के हालिया अनुमानों पर प्रतिक्रिया देते हुए डॉ. परोदा ने कहा कि भारतीय कॉटन उद्योग कई संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने, किसानों की आय सुधारने और टेक्सटाइल वैल्यू चेन को मजबूत करने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता पर जोर दिया।CAI के अनुसार, 2025-26 सीजन में भारत का कॉटन आयात लगभग 6 मिलियन बेल (60 लाख बेल) तक पहुंच सकता है, जबकि निर्यात घटकर करीब 1.5 मिलियन बेल (15 लाख बेल) रहने का अनुमान है। घरेलू खपत का अनुमान 34.8 मिलियन बेल (348 लाख बेल) तक बढ़ाया गया है, जो उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है।डॉ. परोदा ने कहा कि भारत ने लंबे समय तक वैश्विक कॉटन बाजार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ रही हैं। उन्होंने कहा कि नई कृषि तकनीकों को अपनाने और पारदर्शी, विज्ञान-आधारित नियामक व्यवस्था के माध्यम से इस क्षेत्र को मजबूत किया जा सकता है।उन्होंने कहा कि कई प्रमुख कॉटन उत्पादक देशों ने आधुनिक कृषि तकनीकों और जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के जरिए उत्पादकता में सुधार किया है। भारतीय किसानों को भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नई तकनीकों तक बेहतर पहुंच मिलनी चाहिए।डॉ. परोदा ने बताया कि कॉटन सेक्टर करीब 70 लाख किसानों की आजीविका से जुड़ा है और देश के टेक्सटाइल उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराता है। उन्होंने कहा कि उत्पादकता सुधार से किसानों की आय बढ़ाने के साथ पूरी कॉटन वैल्यू चेन को मजबूती मिलेगी।उन्होंने कॉटन मिशन को सकारात्मक कदम बताते हुए कहा कि इसमें उन्नत कृषि तकनीकों की भूमिका पर भी ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि विज्ञान-आधारित नीतियों और नवाचारों को बढ़ावा देकर भारत वैश्विक कॉटन क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।और पढ़ें :- MMF की मांग बढ़ेगी: नुवामा

MMF की मांग बढ़ेगी: नुवामा

कॉटन की घटती आपूर्ति से बढ़ेगी मैन-मेड फाइबर की मांग: नुवामानई दिल्ली: भारत में कॉटन का अधिशेष लगातार कम होने से टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में मैन-मेड फाइबर (एमएमएफ) की मांग बढ़ने और इस क्षेत्र में निवेश व क्षमता विस्तार को गति मिलने की संभावना है। नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ की एक रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है।रिपोर्ट के अनुसार, भारत का कॉटन बाजार अब अधिशेष स्थिति से निकलकर संतुलित आपूर्ति की ओर बढ़ रहा है। कॉटन उत्पादन कॉटन सीजन (CS) 2021 के 6.31 अरब किलोग्राम से घटकर CS26 में लगभग 4.95 अरब किलोग्राम रहने का अनुमान है। वहीं, इसी अवधि में कॉटन आयात 0.26 अरब किलोग्राम से बढ़कर करीब 0.80 अरब किलोग्राम तक पहुंच गया है।इसके विपरीत, कॉटन निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। निर्यात CS21 के 1.28 अरब किलोग्राम से घटकर CS26 में लगभग 0.20 अरब किलोग्राम रहने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक, सीमित घरेलू उपलब्धता और वैश्विक मांग में बदलाव के कारण कॉटन बाजार में आपूर्ति का दबाव बढ़ा है।कॉटन कीमतों में भी इस बदलाव का असर दिखाई दिया है। शंकर-6 कॉटन की कीमतें CS21 में 110 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर CS23 में 221 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई थीं। हालांकि बाद में कीमतों में नरमी आई और वे लगभग 155 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गईं, लेकिन भारत का पारंपरिक मूल्य लाभ काफी हद तक कम हो चुका है।नुवामा ने कहा कि वैश्विक कॉटन व्यापार में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश की स्पिनिंग मिलें भारतीय कच्चे कॉटन की प्रमुख खरीदार बनकर उभरी हैं, जबकि भारत अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से बेहतर गुणवत्ता वाले स्टेपल कॉटन का आयात बढ़ा रहा है, क्योंकि घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं है।रिपोर्ट में कहा गया है कि स्पिनिंग उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता का मार्जिन लगातार कम हो रहा है। कमजोर फसल वाले वर्षों में स्पिनर्स के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, टेक्सटाइल उद्योग के लिए यह बदलाव एमएमएफ आधारित उत्पादन को बढ़ावा दे सकता है और कंपनियों को अपने फाइबर मिश्रण में विविधता लाने की जरूरत होगी।नुवामा के अनुसार, भारत लंबे समय तक वैश्विक बाजार की तुलना में 8-11 प्रतिशत कम कीमत पर कॉटन उपलब्ध कराने वाला अधिशेष उत्पादक रहा, लेकिन अब यह प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त लगभग समाप्त हो चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्त वर्ष 2026 में घरेलू और वैश्विक कॉटन कीमतों के बीच समानता (पैरिटी) मुख्य रूप से आयात शुल्क में अस्थायी छूट का परिणाम रही है।रिपोर्ट के मुताबिक, आयात शुल्क में छूट को सीमित अवधि के लिए जारी रखा गया है। नुवामा का मानना है कि यह स्थिति दर्शाती है कि सरकार का प्राथमिक फोकस किसानों की आय को समर्थन देने पर अधिक रहा है, जबकि टेक्सटाइल मिलों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए उद्योग को वैकल्पिक फाइबर स्रोतों की ओर बढ़ना होगा।और पढ़ें :- कपास बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर

कपास बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर

31 जुलाई तक कपास बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर, तिलहन क्षेत्र बढ़ाकृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा जारी 31 जुलाई 2026 तक के खरीफ बुवाई आंकड़ों के अनुसार, देश में कपास की बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर में हुई है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि के 106.06 लाख हेक्टेयर की तुलना में 2.52 लाख हेक्टेयर कम है। वहीं, सामान्य बुवाई क्षेत्र 125.51 लाख हेक्टेयर के मुकाबले अब तक लगभग 82.5% क्षेत्र में कपास की बुवाई पूरी हो चुकी है।वहीं, तिलहन (Oilseeds) की कुल बुवाई 172.32 लाख हेक्टेयर दर्ज की गई है, जो पिछले वर्ष के 171.13 लाख हेक्टेयर की तुलना में 1.19 लाख हेक्टेयर अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि इस सीजन में तिलहन फसलों का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में बेहतर रहा है।तिलहन फसलों में सोयाबीन का सर्वाधिक क्षेत्र 117.68 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के 118.52 लाख हेक्टेयर से 0.84 लाख हेक्टेयर कम है। हालांकि गिरावट सीमित रही है और कुल तिलहन क्षेत्र में सोयाबीन का सबसे बड़ा योगदान बना हुआ है।इसके अलावा, मूंगफली की बुवाई 43.06 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष के 41.90 लाख हेक्टेयर से 1.16 लाख हेक्टेयर अधिक है। तिल का रकबा 9.27 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के 8.17 लाख हेक्टेयर से 1.10 लाख हेक्टेयर अधिक है। वहीं, सूरजमुखी का रकबा 0.98 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के 0.58 लाख हेक्टेयर की तुलना में 0.40 लाख हेक्टेयर अधिक है।दूसरी ओर, अरंडी (Castor) की बुवाई 1.13 लाख हेक्टेयर रही, जो पिछले वर्ष के 1.79 लाख हेक्टेयर से 0.66 लाख हेक्टेयर कम है। नाइजर का रकबा भी मामूली घटकर 0.10 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि अन्य तिलहन फसलों का क्षेत्र 0.10 लाख हेक्टेयर दर्ज किया गया।देश के अधिकांश हिस्सों में मानसून सक्रिय होने के साथ आने वाले सप्ताहों में कपास और तिलहन की बुवाई के अंतिम आंकड़ों में कुछ और बदलाव देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल, तिलहन का कुल रकबा पिछले वर्ष से अधिक है, जबकि कपास और सोयाबीन का क्षेत्र पिछले वर्ष की तुलना में अभी भी कम बना हुआ है।और पढ़ें :- US डॉलर के मुकाबले रुपया 4 पैसे गिरकर 95.38 पर बंद हुआ

US डॉलर के मुकाबले रुपया 4 पैसे गिरकर 95.38 पर बंद हुआ

मंगलवार को US डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 4 पैसे गिरकर 95.38 पर बंद हुआ। बाजार में सुस्ती के कारण रुपये पर दबाव बना रहा।घरेलू करेंसी 95.34 पर खुली और पूरे ट्रेडिंग सेशन के दौरान दबाव में रही। आखिर में यह 4 पैसे की गिरावट के साथ 95.38 पर बंद हुई।इस बीच, इक्विटी बाजार गिरावट के साथ बंद हुए। सेंसेक्स 210.08 अंक या 0.27 प्रतिशत गिरकर 78,428.95 पर बंद हुआ। निफ्टी 159.40 अंक या 0.64 प्रतिशत गिरकर 24,614.90 पर बंद हुआ।बाजार का रुख लगभग संतुलित रहा; 2,030 शेयरों में बढ़त हुई, 2,037 शेयरों में गिरावट आई और 174 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ। और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.34 पर बिना किसी बदलाव के खुला

Related News

Youtube Videos

आज कपास में तेज़ी या मंदी? 😱 Cotton Market Rate Today | 22 Oct 2026
आज कपास में तेज़ी या मंदी? 😱 Cotton Market Rate Today | 22...
जानिए आज का कपास बाज़ार? 😱 कपास, सीड, खल, यार्न ताज़ा भाव | Cotton Market Rate Today 21 Oct 2026
जानिए आज का कपास बाज़ार? 😱 कपास, सीड, खल, यार्न ताज़ा भाव |...
आज देशभर में रुई के ताज़ा भाव 😱 Cotton Market Rate Today 19 Oct 2026
आज देशभर में रुई के ताज़ा भाव 😱 Cotton Market Rate Today 19...

Circular

title Created At Action
CITI-ICAC का कार्बन क्रेडिट समझौता 06-08-2026 13:53:02 view
भारत-यूके FTA से टेक्सटाइल को बढ़त 06-08-2026 11:14:05 view
डॉलर के मुकाबले रुपया 95.13 पर सपाट खुला 06-08-2026 09:57:52 view
US डॉलर के मुकाबले रुपया 19 पैसे गिरकर 95.11 पर बंद हुआ 05-08-2026 15:47:05 view
कपास उत्पादकता पर सरकार का फोकस 05-08-2026 13:04:08 view
रुपया 46 पैसे की बढ़त के साथ 94.92 प्रति डॉलर पर खुला। 05-08-2026 09:51:52 view
कपास में उन्नत तकनीक जरूरी 04-08-2026 17:24:03 view
MMF की मांग बढ़ेगी: नुवामा 04-08-2026 16:24:48 view
कपास बुवाई 103.54 लाख हेक्टेयर 04-08-2026 16:12:16 view
US डॉलर के मुकाबले रुपया 4 पैसे गिरकर 95.38 पर बंद हुआ 04-08-2026 15:46:49 view
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 95.34 पर बिना किसी बदलाव के खुला 04-08-2026 13:06:03 view
Application Download
Whatsapp Contact