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राजस्थान ने 2030 तक वस्त्र निर्यात चार गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा, विशेष एक्शन प्लान तैयार

2030 तक राजस्थान का टेक्सटाइल निर्यात 4 गुना बढ़ाने का लक्ष्य, सरकार ने तैयार की विशेष कार्ययोजनाराजस्थान सरकार ने टेक्सटाइल और अपैरल सेक्टर को राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार बनाने के लिए बड़े स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा की मंशा के अनुरूप उद्योग एवं वाणिज्य विभाग ने सेक्टर आधारित करीब 15 नई नीतियां लागू की हैं। इसी कड़ी में राजस्थान टेक्सटाइल एवं अपैरल नीति-2025 के बेहतर क्रियान्वयन और निवेश को बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय डेडिकेटेड टेक्सटाइल सेल का गठन किया गया है।राज्य में पहली बार टेक्सटाइल निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश स्तरीय और 11 जिलों के लिए जिला स्तरीय टेक्सटाइल एक्सपोर्ट एक्शन प्लान तैयार किया गया है। इस योजना में भारत सरकार द्वारा चिन्हित 7 चैंपियन जिले—अजमेर, भीलवाड़ा, जयपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, जोधपुर और कोटा—के अलावा चार एस्पिरेशनल जिले श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, नागौर और चूरू शामिल किए गए हैं।उद्योग एवं वाणिज्य आयुक्त नीलाभ सक्सेना ने बताया कि टेक्सटाइल सेल राज्य में उद्योगों की जरूरतों को समझने और उन्हें आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने के लिए काम करेगा। सेल औद्योगिक क्षेत्रों का नियमित दौरा कर उत्पादन और निर्यात से जुड़ी बाधाओं की पहचान करेगा। इसके साथ ही उद्योग विशेषज्ञों, उद्यमियों और निर्यातकों के साथ संवाद कर समाधान तैयार किए जाएंगे।उन्होंने बताया कि सेल देश-विदेश के प्रमुख टेक्सटाइल केंद्रों का अध्ययन करेगा और नवीनतम तकनीकों की जानकारी उद्योगों तक पहुंचाएगा। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय टेक्सटाइल प्रदर्शनियों में राजस्थान की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों का संग्रह और विश्लेषण भी किया जाएगा। इसी वर्ष अक्टूबर में दो दिवसीय टेक्सटाइल समिट आयोजित करने का प्रस्ताव भी है।राज्य सरकार ने राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना (RIPS) के तहत टेक्सटाइल क्षेत्र को थ्रस्ट सेक्टर घोषित किया है, जिसके तहत उद्योगों को अतिरिक्त प्रोत्साहन दिए जा रहे हैं।सक्सेना के अनुसार, भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक वस्त्र एवं परिधान निर्यात को 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसी दिशा में राजस्थान ने अपने टेक्सटाइल निर्यात को 3 से 4 गुना बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।वर्ष 2024-25 में राजस्थान से कुल निर्यात 97,171 करोड़ रुपये से अधिक रहा, जिसमें टेक्सटाइल और इससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान लगभग 13,500 करोड़ रुपये रहा। यह राज्य के कुल निर्यात का 13 प्रतिशत से अधिक है।राजस्थान ऊन उत्पादन में देश में पहले स्थान पर है और करीब 47 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि कपास उत्पादन में पांचवें स्थान पर है। प्रदेश में वर्तमान में 1,800 से अधिक टेक्सटाइल और अपैरल इकाइयां संचालित हैं। हैंडब्लॉक प्रिंटिंग, पारंपरिक तकनीकों और विविध वस्त्र उत्पादों के कारण राजस्थान का टेक्सटाइल उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में विशेष पहचान रखता है। सरकार अब निवेश, तकनीक और निर्यात विस्तार के जरिए इस क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर और मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 3 पैसे मजबूत होकर 96.17 पर खुला

कर्नाटक में ₹50,000 मुआवजे की मांग

सूखे से प्रभावित किसानों के लिए ₹50,000 प्रति एकड़ मुआवजे की मांग, बीवाई विजयेंद्र ने कर्नाटक सरकार को घेराकर्नाटक BJP अध्यक्ष बी. वाई. विजयेंद्र ने उत्तर कर्नाटक और कल्याण कर्नाटक क्षेत्र में सूखे की स्थिति को लेकर राज्य की कांग्रेस सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सूखे से जूझ रहे किसानों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही है और प्रभावित किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता देने में विफल रही है।13 जुलाई को एयरपोर्ट पर आयोजित प्रेस ब्रीफिंग के दौरान विजयेंद्र ने बीदर, कलबुर्गी और यादगीर सहित कई जिलों में किसानों की खराब स्थिति का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में बारिश में भारी कमी के कारण कृषि गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। उनके मुताबिक, कई इलाकों में बारिश सामान्य से काफी कम रही है, जिससे किसान बुवाई तक नहीं कर पाए हैं।विजयेंद्र ने दावा किया कि बारिश की कमी के कारण 30 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि पर खेती नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि अरहर (तुअर), सूरजमुखी और कपास जैसी प्रमुख फसलें प्रभावित हुई हैं, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ा है और कई परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं।उन्होंने राज्य सरकार से सूखे से प्रभावित किसानों के लिए प्रति एकड़ कम से कम ₹50,000 मुआवजा देने की मांग की। विजयेंद्र ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के हालिया बसवकल्याण दौरे को “सिर्फ फोटो शूट” बताते हुए कहा कि सरकार को जमीनी स्तर पर किसानों की मदद के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।BJP नेता ने पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली पिछली BJP सरकार के कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस समय क्षेत्र के विकास के लिए करीब ₹500 करोड़ की परियोजनाएं शुरू की गई थीं और चरणबद्ध तरीके से ₹100 करोड़ तथा ₹200 करोड़ की राशि जारी की गई थी। विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि मौजूदा कांग्रेस सरकार पिछले तीन वर्षों से इन योजनाओं को नजरअंदाज कर रही है।उन्होंने मुख्यमंत्री से लंबित धनराशि तुरंत जारी करने और विकास कार्यों को प्राथमिकता देने की अपील की।बीदर जिला BJP में कथित अंदरूनी मतभेदों के सवाल पर विजयेंद्र ने कहा कि पार्टी सभी स्थानीय मुद्दों को बातचीत और आपसी सहमति से सुलझाएगी। उन्होंने BJP विधायकों और कांग्रेस के बीच किसी भी तरह की “एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स” के आरोपों को खारिज किया और कहा कि BJP जनता और किसानों के हितों के लिए एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा रही है।आगामी जिला पंचायत और स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए विजयेंद्र ने संगठन को और सक्रिय करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि जिला नेताओं, विधायकों और वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बैठक कर चुनावी तैयारियों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर रणनीति बनाई जाएगी।और पढ़ें :- अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 26 पैसे गिरकर 96.20 पर बंद हुआ।

खंडेश में घटी कपास की खेती, किसान मक्का और सोयाबीन की ओर बढ़े

महाराष्ट्र के खानदेश में कपास का रकबा घटा, मक्का और सोयाबीन की ओर बढ़ा किसानों का रुझानजलगांव/महाराष्ट्र: खरीफ सीजन में महाराष्ट्र के खानदेश क्षेत्र में इस साल खेती के पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां एक ओर खरीफ फसलों की बुवाई करीब 81 प्रतिशत पूरी हो चुकी है, वहीं दूसरी ओर कपास की खेती का रकबा लगातार घट रहा है। कपास की बढ़ती लागत, बाजार में कमजोर भाव और कीटों के बढ़ते प्रकोप के कारण किसान अब मक्का, सोयाबीन और अरहर (तूर) जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ रहे हैं।खासकर जलगांव जिले में कपास की खेती का क्षेत्र पिछले सीजन की तुलना में करीब 25,000 हेक्टेयर कम हुआ है। वर्ष 2024-25 में जिले में कपास की खेती लगभग 5.11 लाख हेक्टेयर में की गई थी, जबकि इस साल यह घटकर करीब 4.55 लाख हेक्टेयर रह गई है।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, खानदेश के अन्य जिलों में भी कपास का रकबा कम हुआ है। धुले जिले में इस वर्ष कपास की खेती करीब 1.75 लाख हेक्टेयर में हो रही है, जबकि पिछले सीजन में यह क्षेत्र लगभग 2 लाख हेक्टेयर था। वहीं, नंदुरबार जिले में कपास का रकबा घटकर करीब 85,000 हेक्टेयर रह गया है, जो पिछले साल 97,000 हेक्टेयर से अधिक था।किसानों के अनुसार, कपास की खेती में खर्च लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन के मुकाबले बाजार भाव संतोषजनक नहीं मिल रहे हैं। मजदूरी, खाद, बीज और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने किसानों की लागत बढ़ा दी है। इसके अलावा, गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) के प्रकोप और मौसम में बदलाव ने भी कपास उत्पादकों की चिंता बढ़ाई है।मॉनसून की बारिश में देरी ने भी कई किसानों को वैकल्पिक फसलों की ओर जाने के लिए मजबूर किया है। इस बदलाव का असर मक्का और अन्य खरीफ फसलों के क्षेत्रफल में वृद्धि के रूप में दिखाई दे रहा है। अकेले जलगांव जिले में मक्का की खेती का रकबा करीब 10,000 हेक्टेयर बढ़ा है।कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इस वर्ष पूरे खानदेश क्षेत्र में कपास का कुल रकबा 8 लाख हेक्टेयर से कम रह सकता है। किसानों का फसल चयन अब लागत, जोखिम और बाजार की संभावनाओं को ध्यान में रखकर बदल रहा है।और पढ़ें :- रुपया डॉलर के मुकाबले 32 पैसे टूटकर 95.94 पर खुला.

कमजोर मानसून से तेलंगाना की खरीफ फसल संकट में, 63% मंडल प्रभावित

तेलंगाना में मॉनसून की बेरुखी से खरीफ सीजन पर संकट, 63% मंडल बारिश की कमी से प्रभावितहैदराबाद: तेलंगाना में इस वर्ष कमजोर मॉनसून ने खरीफ सीजन की तस्वीर धुंधली कर दी है। जुलाई के पहले सप्ताह के अंत तक पिछले वर्ष की तुलना में अधिक क्षेत्र में बुवाई और रोपाई होने के बावजूद, राज्य के अधिकांश हिस्सों में वर्षा की भारी कमी के कारण किसानों की चिंता बढ़ गई है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ दिनों में पर्याप्त और लगातार बारिश नहीं हुई, तो फसलों की वृद्धि, उत्पादन और किसानों की आय पर गंभीर असर पड़ सकता है।राज्य के 32 ग्रामीण जिलों के 605 मंडलों में से 382 मंडल (करीब 63 प्रतिशत) मॉनसून की विफलता से प्रभावित हैं। मौसम विभाग ने जुलाई के शेष दिनों में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है, जिससे खरीफ फसलों की संभावनाओं पर संकट के बादल और गहरे हो गए हैं। लगातार कम वर्षा के कारण जलग्रहण क्षेत्रों में स्थित बड़े, मध्यम और छोटे सिंचाई जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं पहुंचा है, जिससे सिंचाई व्यवस्था भी प्रभावित होने लगी है।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष अब तक खरीफ फसलों की खेती का रकबा 55.32 लाख एकड़ तक पहुंच गया है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 52.04 लाख एकड़ था। फसलवार आंकड़ों पर नजर डालें तो किसानों ने सबसे अधिक 39.44 लाख एकड़ में कपास की बुवाई की है। इसके अलावा 4.22 लाख एकड़ में धान की रोपाई, 3.35 लाख एकड़ में सोयाबीन, 3.19 लाख एकड़ में अरहर, 2.84 लाख एकड़ में मक्का तथा लगभग 46 हजार एकड़ में मूंग और उड़द की खेती की गई है।तेलंगाना डेवलपमेंट प्लानिंग सोसाइटी के अनुसार, 68 मंडलों में सामान्य से 60 से 99 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है, जबकि 327 मंडलों में वर्षा सामान्य से 20 से 59 प्रतिशत कम रही। केवल 181 मंडलों में वर्षा सामान्य श्रेणी में दर्ज की गई, लेकिन इनमें भी अधिकांश क्षेत्रों में सामान्य से 19 प्रतिशत तक कम बारिश हुई। दूसरी ओर, केवल 45 मंडलों में सामान्य से अधिक या अत्यधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई है। इनमें से 11 मंडल रंगारेड्डी, नलगोंडा, नागरकुरनूल, विकाराबाद, संगारेड्डी, सूर्यापेट और भद्राद्री-कोठागुडेम जिलों में स्थित हैं।राज्यभर में औसतन वर्षा सामान्य से 25 प्रतिशत कम रही है। सबसे अधिक कमी हनुमाकोंडा जिले में दर्ज की गई, जबकि हैदराबाद सहित 25 जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई। हालांकि पिछले वर्ष अच्छी वर्षा के कारण भूजल स्तर स्थिर बना हुआ है। जून 2025 में औसत भूजल स्तर 9.46 मीटर रहा, जो पिछले वर्ष जून के 9.47 मीटर के लगभग बराबर है।संभावित संकट को देखते हुए कृषि विभाग ने आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की है। अधिकारियों का कहना है कि यदि जुलाई के दूसरे सप्ताह के अंत तक पर्याप्त बारिश नहीं होती, तो किसानों को वैकल्पिक फसलों के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे। साथ ही, कृषि वैज्ञानिक किसानों को कम पानी वाली फसलों और मौसम आधारित खेती अपनाने की सलाह भी दे रहे हैं, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके।और पढ़ें :- कमजोर मानसून से नासिक में खरीफ बुवाई प्रभावित, 45% कृषि भूमि अब भी बिना बोई

कमजोर मानसून से नासिक में खरीफ बुवाई प्रभावित, 45% कृषि भूमि अब भी बिना बोई

नासिक डिवीजन में बुवाई पर बारिश की मार, 45% कृषि क्षेत्र अब भी खालीनासिक रोड: नासिक डिवीजन में कमजोर और असमान मानसून के कारण खरीफ सीजन प्रभावित होता नजर आ रहा है। पिछले सप्ताह कुछ इलाकों में हुई बारिश से किसानों को राहत की उम्मीद जगी थी, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में लगातार और पर्याप्त वर्षा नहीं होने से बुवाई की रफ्तार धीमी बनी हुई है। मॉनसून शुरू हुए करीब डेढ़ महीना बीत जाने के बावजूद मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं होने से बड़ी संख्या में किसान अब भी बुवाई का इंतजार कर रहे हैं। कृषि विभाग के अनुसार, डिवीजन की कुल कृषि योग्य भूमि के लगभग 45 प्रतिशत हिस्से में अब तक बुवाई नहीं हो सकी है।बढ़ती कृषि लागत ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। बीज, उर्वरक, खेत की तैयारी और मजदूरी पर होने वाला खर्च पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका है। ऐसे में किसान कम नमी वाली जमीन में बुवाई का जोखिम नहीं लेना चाहते। उनका कहना है कि यदि पर्याप्त बारिश के बिना बुवाई की गई, तो बीज खराब होने और दोबारा बुवाई की नौबत आ सकती है, जिससे लागत दोगुनी हो जाएगी। यही कारण है कि अधिकांश किसान अच्छी और लगातार बारिश का इंतजार कर रहे हैं।कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नासिक डिवीजन में खरीफ फसलों का औसत रकबा 20.33 लाख हेक्टेयर है। इसके मुकाबले अब तक केवल 11.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई पूरी हो पाई है, यानी लगभग 55 प्रतिशत क्षेत्र में खेती शुरू हुई है, जबकि शेष 45 प्रतिशत क्षेत्र अब भी खाली है। नासिक और नंदुरबार जिले सबसे अधिक प्रभावित माने जा रहे हैं।विभाग ने किसानों को मौसम का पूर्वानुमान देखकर ही बुवाई करने की सलाह दी है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मिट्टी में पर्याप्त नमी होने के बाद ही बीज बोए जाएं और उर्वरकों का संतुलित उपयोग किया जाए। यदि सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है, तो किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और कृषि संबंधी सलाह उपलब्ध कराई जाएगी।इस बीच, नगरसुल के सेवानिवृत्त शिक्षक अंकुश निवृत्ति निकम ने खेती की लागत कम करने के लिए आधुनिक मशीनों के उपयोग का उदाहरण पेश किया है। उन्होंने इंटर-कल्टिवेशन के लिए मैकेनिकल वीडर खरीदा है, जिससे एक एकड़ में गुड़ाई का काम केवल एक लीटर पेट्रोल में पूरा हो जाता है। उनके अनुसार, जहां बैलों से यही काम कराने पर करीब 1,600 रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है, वहीं मशीन से यह लागत घटकर लगभग 100 रुपये रह जाती है। यह मशीन प्रतिदिन तीन से चार एकड़ क्षेत्र में काम कर सकती है, जिससे मजदूरी पर होने वाला खर्च भी काफी कम हो जाता है।निकम ने किसानों से खेती में आधुनिक मशीनों को अपनाने की अपील की है। वहीं स्थानीय सोसायटी के प्रभाकर जगन्नाथ कुडके ने सरकार से मांग की है कि बड़े ट्रैक्टरों की तरह छोटे ट्रैक्टरों और इंटर-कल्टिवेशन मशीनों पर भी सब्सिडी दी जाए, ताकि अधिक किसान आधुनिक तकनीक का लाभ उठाकर खेती की लागत कम कर सकें।और पढ़ें :- कपास की खेती पर ₹14,000 से ₹27,000 तक सहायता, जानें कौन उठा सकता है योजना का लाभ

कपास की खेती पर ₹14,000 से ₹27,000 तक सहायता, जानें कौन उठा सकता है योजना का लाभ

कपास की खेती के लिए ₹14,000 से ₹27,000 तक की सहायता, जानिए कौन उठा सकता है योजना का लाभदेश में कपास का उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय में वृद्धि करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक "मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी (कपास क्रांति मिशन)" शुरू किया है। इस मिशन के तहत आधुनिक खेती की तकनीकों को बढ़ावा देकर कपास की उत्पादकता में सुधार लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसी क्रम में गुजरात सरकार ने राज्य में इस योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ₹134.80 करोड़ के बजट को मंजूरी दी है।गुजरात देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य सरकार ने इस योजना के तहत कपास की खेती वाले 21 जिलों में 1 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य तय किया है। कच्छ जिले में पिछले वर्ष 77,760 हेक्टेयर में कपास की बुवाई हुई थी, जबकि इस वर्ष बारिश के कारण अब तक केवल 48 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी है।योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को i-Khedut पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। आवेदन करने वाले किसान का पंजीकृत होना और सरकार द्वारा अनुमोदित या प्रमाणित Bt कपास के बीज का उपयोग करना अनिवार्य है।सरकार दो आधुनिक खेती तकनीकों को अपनाने वाले किसानों को आर्थिक सहायता प्रदान करेगी। इंटीग्रेटेड क्रॉप मैनेजमेंट (ICM) के तहत 90×60 सेंटीमीटर की दूरी पर बुवाई करने वाले किसानों को प्रति खाते ₹14,000 तक की इनपुट सहायता मिलेगी। वहीं क्लोज़ स्पेसिंग टेक्नोलॉजी (CST) के तहत 90×30 सेंटीमीटर की दूरी पर बुवाई करने पर प्रति खाते ₹27,000 तक की सहायता दी जाएगी। दोनों ही मामलों में सहायता की अधिकतम सीमा 2 हेक्टेयर तक निर्धारित की गई है।इस योजना के लिए आवेदन 10 जुलाई 2026 से शुरू हो चुके हैं और 24 जुलाई 2026 तक किए जा सकते हैं। योजना का लाभ केवल गुजरात के कच्छ, राजकोट, जामनगर, छोटा उदेपुर, गिर सोमनाथ, अमरेली, सुरेंद्रनगर, भावनगर, बोटाद, भरूच, अहमदाबाद, वडोदरा, साबरकांठा, नर्मदा, मेहसाणा, बनासकांठा, अरावली, गांधीनगर, मोरबी, जूनागढ़ और पाटन जिलों के किसानों को मिलेगा।आवेदन के लिए आधार कार्ड, 7/12 और 8-A भूमि रिकॉर्ड, बैंक पासबुक या रद्द चेक की प्रति तथा आधार से लिंक सक्रिय मोबाइल नंबर आवश्यक हैं। सरकार का उद्देश्य इस योजना के माध्यम से किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना, उत्पादन बढ़ाना और कपास की खेती को अधिक लाभकारी बनाना है।और पढ़ें :- पंजाब में कपास का रकबा रिकॉर्ड निचले स्तर पर, व्हाइटफ्लाई और पिंक बॉलवर्म का खतरा बढ़ा

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