खानदेश में फीकी पड़ी ‘सफेद सोने’ की चमक, कपास उत्पादन में 40% गिरावट
खानदेश क्षेत्र में इस वर्ष कपास उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है, जिससे कपास का सीजन समय से पहले समाप्त होता दिखाई दे रहा है। आमतौर पर अप्रैल–मई तक चलने वाला कपास सीजन इस बार मार्च की शुरुआत में ही ठहर गया है। हालांकि कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) ने खरीद की समय सीमा 15 मार्च तक बढ़ाई है, लेकिन मंडियों में कपास की आवक लगभग बंद हो चुकी है।
राज्य के खानदेश, विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कपास की खेती होती है, जिसे किसान ‘सफेद सोना’ मानते हैं। इस बार मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों और भारी बारिश के कारण उत्पादन पर बड़ा असर पड़ा है।
बाजार में कीमतों में गिरावट
पिछले दो सप्ताह में जलगांव और खानदेश की निजी मंडियों में कपास के दाम 300 से 400 रुपये प्रति क्विंटल तक गिर गए हैं। फिलहाल बाजार में कपास की कीमत 6500 से 7000 रुपये प्रति क्विंटल के बीच चल रही है। कई किसानों ने बेहतर कीमत की उम्मीद में कपास घर पर ही रोककर रखी थी, लेकिन कीमतों में गिरावट से उन्हें निराशा का सामना करना पड़ रहा है। कम दाम मिलने के कारण कई किसान अपनी उपज बाजार में लाने से बच रहे हैं, जिससे निजी जिनिंग और प्रेसिंग फैक्ट्रियां भी लगभग बंद पड़ी हैं।
किसानों के पास बड़ी मात्रा में स्टॉक
खानदेश में करीब एक लाख गांठ बनाने लायक कपास अभी भी किसानों के पास मौजूद है। यह स्टॉक मुख्य रूप से बड़े किसानों के पास है, जिन्होंने कीमत बढ़ने की उम्मीद में कपास रोककर रखा है। खानदेश जिनिंग एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष प्रदीप जैन के अनुसार मौजूदा बाजार हालात को देखते हुए यह कपास अब अगले सीजन में ही बाजार में आने की संभावना है।
सरकारी केंद्रों से किसानों की दूरी
सीजन के अंत में मंडियों में आने वाली कपास को सरकारी खरीद केंद्रों पर अक्सर नमी या गुणवत्ता की कमी बताकर अस्वीकार किया जा रहा है। इससे किसान निराश होकर सरकारी केंद्रों से दूरी बना रहे हैं और अपनी उपज घर पर ही रखने को मजबूर हैं।