कपास आयात शुल्क में छूट से स्पिनिंग मिलों को राहत, मुनाफे के मार्जिन में सुधार की उम्मीद
भारतीय सूती कपड़ा उद्योग, खासकर धागा बनाने वाली स्पिनिंग मिलों को बड़ी राहत मिली है। केंद्र सरकार ने कच्चे कपास के आयात पर 11% सीमा शुल्क की छूट 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दी है। इससे मिलों को कच्चे माल की लागत नियंत्रित करने और मुनाफे के मार्जिन को बनाए रखने में मदद मिलने की उम्मीद है।
चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है, लेकिन चालू सीजन में घरेलू उत्पादन का अनुमान उत्साहजनक नहीं है। साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के अनुसार, कपास सीजन 2026-27 में उत्पादन लगभग 280 लाख गांठ रहने का अनुमान है। सामान्य तौर पर उत्पादन 300 लाख गांठ से अधिक रहता है, जबकि उद्योग की जरूरत करीब 360 लाख गांठ है। कमजोर उत्पादन अनुमान के बीच कपास की कीमतें पिछले एक साल की तुलना में लगभग 33% तक बढ़ गई हैं।
बढ़ती लागत से निर्यात प्रतिस्पर्धा पर दबाव
कपास की ऊंची कीमतों से भारतीय धागे, कपड़े और परिधान की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होने की चिंता है। यह चुनौती ऐसे समय में सामने आई है, जब भारत ब्रिटेन और अमेरिका सहित नए बाजारों में व्यापार के अवसर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। कपड़ा मंत्रालय का लक्ष्य 2030 तक कपड़ा क्षेत्र के कारोबार को मौजूदा लगभग 172 अरब डॉलर से बढ़ाकर 350 अरब डॉलर करना और निवेश के जरिए उत्पादन क्षमता का विस्तार करना है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में निर्यात में अपेक्षित तेजी नहीं आई है।
स्पिनिंग मिलों के मार्जिन में सुधार की संभावना
कपास आयात पर पहले दी गई शुल्क छूट से स्पिनिंग मिलों और कपड़ा निर्माताओं को लाभ हुआ है। बाजार अनुमानों के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 की दूसरी तिमाही (Q2FY2027) में सूचीबद्ध कंपनियां राजस्व वृद्धि के साथ EBITDA मार्जिन में भी सुधार दर्ज कर सकती हैं। EBITDA का अर्थ ब्याज, कर, मूल्यह्रास और अमोर्टाइजेशन से पहले की कमाई है।
KPR मिल्स, वर्धमान टेक्सटाइल्स, अंबिका कॉटन और इंडो काउंट जैसी कंपनियों ने तिमाही-दर-तिमाही आधार पर मार्जिन में 200–300 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी दर्ज की है। त्योहारी मांग और निर्यात ऑर्डर बढ़ने से मिलों की क्षमता का बेहतर उपयोग होने की उम्मीद है। हालांकि, घरेलू कपास की कमी और कीमतों में संभावित बढ़ोतरी इस लाभ को सीमित कर सकती है।
शून्य आयात शुल्क से कच्चे माल की उपलब्धता को मदद
शुल्क छूट से मिलों को घरेलू और आयातित कपास की कीमतों की तुलना कर खरीद संबंधी निर्णय लेने का अवसर मिलेगा। SIMA के अनुसार, धागा बनाने की लागत में कपास का हिस्सा लगभग 70%, कपड़ा बनाने में 50% और तैयार परिधान में 30–35% होता है। इसलिए प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अच्छी गुणवत्ता वाला कपास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होना जरूरी है।
कपास की कीमतों में अनिश्चितता के कारण स्पिनिंग मिलों के शेयरों में तेजी प्रभावित हुई है। आगे कंपनियों की लाभप्रदता घरेलू और वैश्विक मांग, कपास की उपलब्धता तथा कच्चे माल की लागत पर निर्भर करेगी।
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