CAI के अध्यक्ष विनय कोटक ने CNBC आवाज़ से बातचीत में बताया कि अमेरिका–बांग्लादेश की डील भारत के वस्त्र बाज़ार को कैसे प्रभावित कर सकती है।
अमेरिका ने जो ड्यूटी में छूट (ड्यूटी माफी) दी है, वह केवल कॉटन (रुई) के मूल्य के अनुपात में दी है, यानी अगर किसी अपेरल की कुल कीमत ₹100 है और उसमें कॉटन का मूल्य ₹20 है, तो 18% ड्यूटी छूट का लाभ सिर्फ उसी ₹20 पर दिया गया है। इसका अर्थ है कि कुल मूल्य के हिसाब से यह फायदा लगभग 3–4% तक ही होता है।
बांग्लादेश का कुल निर्यात (एक्सपोर्ट) अमेरिका को लगभग 25% है, जबकि उसका लगभग 50% अपेरल यूरोप में निर्यात हो रहा है। वहीं भारत का निर्यात अमेरिका में लगभग 15% है। अमेरिका जो नई नीतियाँ बना रहा है—खासतौर पर चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में—उन नीतिगत बदलावों का लाभ भारत को मिल सकता है। इसलिए संभावना है कि भारत का हिस्सा (मार्केट शेयर) थोड़ा बढ़ेगा, घटेगा नहीं।
दूसरी ओर, अब तक बांग्लादेश को यूरोप में शून्य ड्यूटी (zero duty) का लाभ था, जिससे भारत को नुकसान होता था। लेकिन 1 जनवरी 2027 से भारत के निर्यात पर भी यूरोप में कोई ड्यूटी नहीं लगेगी। इससे हमें यूरोपीय बाजार में बड़ा विस्तार करने का अवसर मिलेगा और उस क्षेत्र में हम बांग्लादेश को काफ़ी हद तक पीछे छोड़ सकते हैं।
भारत की रुई (कॉटन) बांग्लादेश जा रही है क्योंकि हमारे पास भौगोलिक (locational) लाभ है — भारत से माल बांग्लादेश पहुँचने में केवल 8 दिन लगते हैं, जबकि अमेरिका से वही माल पहुँचने में कम से कम 45 दिन लगते हैं। इसी कारण, वहाँ की मिलें भारत से थोड़ा अधिक दाम देकर भी रुई खरीद रही हैं। अगर भारत से सड़क मार्ग (road route) का निर्यात फिर से शुरू हो जाए, तो हमें किसी विशेष फर्क का सामना नहीं करना पड़ेगा।
जैसे ऑस्ट्रेलियाई कपास (Australian cotton) के लिए ड्यूटी-फ्री कोटा है, वैसे ही अमेरिकी कपास (American cotton) के लिए भी ड्यूटी-फ्री कोटा होना चाहिए। तब प्रतिस्पर्धा में कोई समस्या नहीं रहेगी। फिलहाल अमेरिकी कपास पर लगभग 11% ड्यूटी लग रही है, जो हमारे लिए बोझिल (कठिन) है। अगर हम इसे एडवांस लाइसेंस के तहत भी आयात करें, तो औसतन 4.5% ड्यूटी का नुकसान इंसेंटिव्स के रूप में झेलना पड़ता है।
इसलिए या तो कपास के आयात पर पूरी ड्यूटी समाप्त की जाए, या कम से कम अमेरिका से आयात के लिए 5 से 10 लाख गांठों (bales) का ड्यूटी-फ्री कोटा तय किया जाए।