अकोला में कपास किसानों पर सूखे की मार, 70% तक नुकसान की आशंका
महाराष्ट्र के अकोला जिले में लंबे समय तक बारिश नहीं होने और बढ़ते तापमान के कारण कपास की फसल प्रभावित हुई है। पिछले सीजन में अच्छे बाजार भाव से किसानों को बेहतर कमाई हुई थी, लेकिन इस साल सूखे की स्थिति ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। किसानों के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में कपास की फसल को 70% तक नुकसान होने की आशंका है।
पिछले सीजन में भारतीय कपास निगम (CCI) के खरीद मूल्य के तहत किसानों को लगभग ₹8,000 प्रति क्विंटल मिले थे। वहीं, अगस्त तक कपास का स्टॉक रोककर रखने वाले कुछ किसानों को ₹10,000 प्रति क्विंटल तक भाव मिलने की बात सामने आई थी। बेहतर कमाई से उत्साहित होकर क्षेत्र के कई किसानों ने हाई-डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS), जिसे 'अकोला मॉडल' भी कहा जाता है, को अपनाया था।
सूखे से पारंपरिक और HDPS खेती प्रभावित
सामान्य परिस्थितियों में पारंपरिक कपास खेती से प्रति एकड़ लगभग 8 क्विंटल उत्पादन मिल सकता है, जबकि HDPS के तहत 12 से 18 क्विंटल प्रति एकड़ उपज मिलने का दावा किया जाता है। हालांकि, इस सीजन लंबे समय तक बारिश नहीं होने से दोनों पद्धतियों से उगाई गई फसल प्रभावित हुई है।
किसानों के मुताबिक, कपास के पौधे अपेक्षित ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाए हैं। समय से पहले डोडे फटने और पौधों की वृद्धि रुकने से उत्पादन तथा रेशे की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ गई है। मिट्टी में नमी की कमी के कारण पत्तियां, फूल और छोटे डोडे सूखकर गिर रहे हैं।
अकोला के कपास उत्पादक और HDPS को शुरुआती दौर में अपनाने वालों में शामिल दिलीप ठाकरे ने बताया कि इस साल प्रति एकड़ केवल 2 से 4 क्विंटल उपज मिलने की आशंका है। उनके अनुसार, HDPS वाले खेतों में भी फसल की स्थिति अच्छी नहीं है, हालांकि अधिक पौधों के कारण इस पद्धति से कुछ बेहतर उत्पादन मिलने की उम्मीद है।
लंबे समय से बारिश नहीं होने से फसल पर असर
दिलीप ठाकरे के मुताबिक, जिले के खारे पानी वाले क्षेत्र में स्थिति विशेष रूप से गंभीर है। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में लगभग 70 दिनों से बारिश नहीं हुई है, जिससे कपास की फसल पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
सांगवी बाजार क्षेत्र के किसान डॉ. पुरुषोत्तम मधुकर काले पारंपरिक तरीके से कपास की खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि बारिश की कमी से पौधों की वृद्धि प्रभावित हुई है और इस साल प्रति एकड़ केवल 2 से 3 क्विंटल उपज मिलने की उम्मीद है। उनके अनुसार, HDPS वाली फसल की स्थिति भी खराब है, हालांकि इससे कुछ बेहतर उत्पादन मिल सकता है।
कीटों के हमले से बढ़ी खेती की लागत
सूखे के साथ कीटों के हमले ने भी किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। फसल बचाने के लिए बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत बढ़ रही है। खाद, मजदूरी और कीटनाशकों पर खर्च करने के बावजूद किसानों को इस साल निवेश की भरपाई करना मुश्किल लग रहा है।
उरल गांव के किसान दिलीप पटोकर ने बताया कि बार-बार छिड़काव के कारण खर्च बढ़ गया है और परिवार का रोजमर्रा का खर्च चलाना भी चिंता का विषय बन गया है। वहीं, अंडुरा गांव के शालिग्राम भगत ने कहा कि नमी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण पत्तियां, फूल और छोटे कपास के डोडे झड़ गए हैं।
किसानों का कहना है कि लंबे समय तक बारिश की कमी और मिट्टी में नमी के अभाव के सामने खेती की कोई भी पद्धति पूरी तरह नुकसान से नहीं बचा सकती। मौजूदा स्थिति ने अकोला के कपास उत्पादकों के सामने कम उत्पादन, बढ़ती लागत और आय में गिरावट की गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।
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