भारत में कपास की खेती का रकबा, जो 2024 के खरीफ सीजन में लगभग 10% तक घटा था, 2025 में और कम होने की संभावना जताई जा रही है। इसका मुख्य कारण किसानों का मक्का और मूंगफली जैसी वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ता रुझान है। उत्तर और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में, जहाँ मानसून समय से पहले पहुंचा, बुवाई की शुरुआत जरूर हुई है, लेकिन पूरे उद्योग में आगामी 2025-26 सीजन को लेकर मिश्रित राय बनी हुई है।
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CAI) के अध्यक्ष अतुल एस. गनात्रा के अनुसार, मध्य भारत—जो देश के कुल कपास उत्पादन का लगभग 66% योगदान देता है—में कपास का रकबा घटने की संभावना है। उन्होंने बताया कि “उत्तर और दक्षिण भारत में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर देश में कपास का रकबा 7-8% तक कम हो सकता है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि गुजरात में किसान कपास की जगह मूंगफली की खेती की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में मक्का को प्राथमिकता दी जा रही है। इसका कारण कम पैदावार, बढ़ती लागत, मजदूरी खर्च और वैकल्पिक फसलों से बेहतर लाभ बताया जा रहा है।
जोधपुर स्थित साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के निदेशक भागीरथ चौधरी ने कहा कि इस बार कपास बुवाई की शुरुआत धीमी रही है और उत्तर भारत में देरी देखने को मिली है। उन्होंने बताया कि पानी की कमी, अत्यधिक गर्मी और रेत के तूफानों ने फसल पर नकारात्मक प्रभाव डाला है, जिससे केवल 65–70% बुवाई ही पूरी हो सकी है।
उन्होंने यह भी कहा कि कपास तकनीक मिशन “कपास 2.0” के लिए स्पष्ट रोडमैप न होने के कारण उत्तरी राज्यों में कपास का रकबा लगातार पांचवें वर्ष घटने की ओर है।
वैश्विक स्तर पर अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) ने अनुमान लगाया है कि 2025-26 में भारत का कपास उत्पादन 2% घटकर 24.5 मिलियन गांठ रह सकता है। हालांकि कुल क्षेत्रफल लगभग 11.80 मिलियन हेक्टेयर पर स्थिर रहने की संभावना है।
घरेलू बाजार में मांग कमजोर रहने और वैश्विक अनिश्चितता के चलते कपास बाजार में सुस्ती बनी हुई है। फिर भी कुछ क्षेत्रों में बेहतर बारिश और जल उपलब्धता के कारण शुरुआती बुवाई देखी गई है।
रायचूर के ऑल इंडिया कॉटन ब्रोकर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष रामानुज दास बूब ने बताया कि आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में बुवाई पूरी हो चुकी है और सितंबर तक शुरुआती आवक संभव है।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कमजोर वैश्विक मांग और कीमतों में स्थिरता की कमी बाजार पर दबाव बनाए हुए है। कपास की कीमतें अभी भी MSP से नीचे चल रही हैं, जिससे CCI के पास बड़े स्टॉक जमा होने की संभावना है और अगले सीजन में सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है।
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