गुलाबी सुंडी और बढ़ती लागत ने छीनी ‘सफेद सोना’ की चमक, नागौर में सात वर्षों के निचले स्तर पर पहुंची कपास की बुवाई
नागौर: राजस्थान के नागौर जिले में कभी किसानों की पहली पसंद मानी जाने वाली नकदी फसल कपास अब धीरे-धीरे अपनी चमक खोती जा रही है। ‘सफेद सोना’ कहलाने वाली यह फसल अब किसानों के लिए कम लाभदायक साबित हो रही है। लगातार घटती पैदावार, खेती की बढ़ती लागत, गुलाबी सुंडी का बढ़ता प्रकोप और बाजार में अपेक्षित मूल्य नहीं मिलने के कारण किसानों का रुझान तेजी से वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ रहा है। इसका असर खरीफ 2026 की बुवाई में भी साफ दिखाई दिया है।
कृषि विभाग ने खरीफ 2026 के लिए जिले में 62,000 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई का लक्ष्य निर्धारित किया था, लेकिन सीजन के अंत तक केवल 32,150 हेक्टेयर क्षेत्र में ही बुवाई हो सकी। यह निर्धारित लक्ष्य का लगभग 52 प्रतिशत है और पिछले सात वर्षों में जिले में कपास के सबसे कम रकबे को दर्शाता है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार नागौर की बलुई दोमट मिट्टी में लंबे समय तक लगातार कपास की खेती किए जाने से मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता प्रभावित हुई है। उनका कहना है कि कपास मुख्य रूप से काली मिट्टी की फसल है। ऐसे में बलुई दोमट क्षेत्रों में लगातार इसकी खेती करने से उत्पादन में लगातार गिरावट आई है। इसी कारण इस वर्ष किसानों ने ग्वार जैसी वैकल्पिक फसलों को प्राथमिकता दी। खरीफ 2026 में जिले में 1,24,250 हेक्टेयर क्षेत्र में ग्वार की बुवाई दर्ज की गई।
किसानों के अनुसार वर्तमान में कपास का औसत उत्पादन केवल 1.5 से 2 क्विंटल प्रति बीघा रह गया है। लगभग 10 बीघा में कपास की खेती से कुल आय करीब 1.20 लाख रुपये तक पहुंचती है, लेकिन बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी और अन्य कृषि लागत घटाने के बाद शुद्ध लाभ बहुत कम बचता है। ऐसे में कपास की खेती किसानों के लिए पहले जितनी लाभदायक नहीं रह गई है।
पिछले सात वर्षों के आंकड़े भी कपास के घटते रकबे की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2020 में जिले में 56,143 हेक्टेयर, 2021 में 58,457 हेक्टेयर, 2022 में 74,557 हेक्टेयर, 2023 में 48,500 हेक्टेयर, 2024 में 59,302 हेक्टेयर, 2025 में 37,250 हेक्टेयर तथा 2026 में घटकर केवल 32,150 हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई दर्ज की गई, जो सात वर्षों का सबसे निचला स्तर है।
शुरुआती वर्षों में बीटी कपास (Bt Cotton) ने गुलाबी सुंडी के प्रकोप को काफी हद तक नियंत्रित किया था, लेकिन अब यह कीट बीटी किस्मों को भी प्रभावित करने लगा है। इसके कारण किसानों का कीटनाशकों पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। हालांकि सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए मध्यम रेशा (Medium Staple) कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य 7,710 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है, लेकिन कम पैदावार और बढ़ती उत्पादन लागत के कारण किसानों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। यही वजह है कि नागौर के प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र डेगाना और मेड़ता में भी किसान तेजी से ग्वार तथा अन्य वैकल्पिक फसलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुलाबी सुंडी पर प्रभावी नियंत्रण, लागत में कमी और बेहतर बाजार मूल्य सुनिश्चित नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में जिले में कपास का रकबा और घट सकता है।
और पढ़ें :- तेलंगाना में खरीफ बुवाई तेज