वैश्विक कपास बाजार में भारत की स्थिति मजबूत, उत्पादन और खपत में दूसरे स्थान पर

2026-07-22 15:07:25
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भारत का कॉटन सेक्टर वैश्विक बाजार में मजबूत कर रहा अपनी स्थिति

नई दिल्ली: भारत ग्लोबल कॉटन इंडस्ट्री में अपनी स्थिति लगातार मजबूत कर रहा है। कॉटन की खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि कॉटन उत्पादन और खपत दोनों के लिहाज से यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है।

वर्ष 2025-26 में भारत का कॉटन उत्पादन 290.91 लाख बेल अनुमानित है, जबकि घरेलू खपत 328 लाख बेल तक पहुंचने की संभावना है। वैश्विक फाइबर उत्पादन में भारत का योगदान लगभग 19% है। वहीं, वर्ष 2024-25 में भारत की वैश्विक कॉटन एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी वैल्यू के आधार पर लगभग 3.37% रही, जिसकी कीमत करीब 11.49 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी।

भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां कॉटन की सभी चार मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें गॉसिपियम आर्बोरियम (Gossypium arboreum) और गॉसिपियम हर्बेशियम (Gossypium herbaceum) — एशियन कॉटन, गॉसिपियम बारबाडेंस (Gossypium barbadense) — इजिप्शियन, सी आइलैंड और पेरूवियन कॉटन तथा गॉसिपियम हिरसुटम (Gossypium hirsutum) — अमेरिकन या अपलैंड कॉटन शामिल हैं।

तीन एग्रो-इकोलॉजिकल ज़ोन में फैली खेती

कॉटन एक खरीफ और सेमी-ज़ीरोफाइट फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से ट्रॉपिकल और सबट्रॉपिकल क्षेत्रों में की जाती है। इसकी बेहतर वृद्धि के लिए 21–27°C तापमान, कम से कम 210 फ्रॉस्ट-फ्री दिन और 50–100 सेमी वर्षा उपयुक्त मानी जाती है।

कॉटन के लिए अच्छी जल निकासी वाली काली (रेगुर) मिट्टी और एल्यूवियल मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

भारत में कॉटन की खेती नौ प्रमुख राज्यों में तीन एग्रो-इकोलॉजिकल ज़ोन में फैली हुई है:

नॉर्दर्न ज़ोन: पंजाब, हरियाणा और राजस्थान
सेंट्रल ज़ोन: गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश
सदर्न ज़ोन: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक
कॉटन सेक्टर के सामने प्रमुख चुनौतियां

भारत के कॉटन सेक्टर की प्रमुख चुनौतियों में कम उत्पादकता शामिल है। अनियमित वर्षा, सूखे की स्थिति और लगभग 67% कॉटन क्षेत्र का बारिश आधारित खेती पर निर्भर होना उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है।

इसके अलावा, पिंक बॉलवर्म और अन्य कीटों का प्रकोप फसल नुकसान बढ़ाता है और किसानों की लागत में वृद्धि करता है।

कॉटन बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव, सीमित बाजार इंफ्रास्ट्रक्चर और आय से जुड़े जोखिम किसानों को प्रभावित करते हैं। वहीं, एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कॉटन का सीमित उत्पादन और फाइबर गुणवत्ता में असमानता भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा के सामने चुनौती बनी हुई है।

उत्पादकता बढ़ाने, बेहतर गुणवत्ता वाले कॉटन के उत्पादन और आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने से भारत वैश्विक कॉटन सप्लाई चेन में अपनी भूमिका को और मजबूत कर सकता है।


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