महाराष्ट्र: कपास आयात नीति से किसानों की चिंता बढ़ी, कीमतों पर दबाव की आशंका
ड्यूटी-मुक्त आयात की अवधि 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ी; उत्पादन में गिरावट और बढ़ती लागत के बीच किसानों को बेहतर भाव मिलने की उम्मीद प्रभावित
महाराष्ट्र सहित देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं के कारण फसल को नुकसान पहुंचा है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने कपास के ड्यूटी-मुक्त आयात की अवधि 31 दिसंबर 2026 तक बढ़ा दी है। इस फैसले से किसानों की चिंता बढ़ गई है। उनका मानना है कि घरेलू उत्पादन में गिरावट के बावजूद आयात जारी रहने से कपास की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में इस साल कपास उत्पादन प्रभावित हुआ है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 2025-26 में घरेलू उत्पादन लगभग 280 लाख गांठ रहने की उम्मीद है, जबकि खपत करीब 360 लाख गांठ रहने का अनुमान है। इसी अवधि में लगभग 72 लाख गांठ कपास आयात होने की संभावना है। ये उद्योग के अनुमान हैं और वास्तविक आंकड़े अलग हो सकते हैं।
उत्पादन में गिरावट के कारण किसानों को बेहतर कीमतों की उम्मीद थी। कुछ बाजारों में कपास के भाव ₹10,000 प्रति क्विंटल तक पहुंच चुके थे। हालांकि, ड्यूटी-मुक्त आयात की अवधि बढ़ने से घरेलू बाजार में कीमतों की तेजी सीमित रहने की आशंका है। कम पैदावार और बढ़ती उत्पादन लागत से किसानों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है।
भारत में कपास की औसत उत्पादकता लगभग 430-440 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि वैश्विक औसत करीब 815 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताया जाता है। उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहतर बीज, कृषि अनुसंधान और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक अपनाने की जरूरत है।
उद्योग सूत्रों के अनुसार, दिसंबर तक कपास आयात लगभग 25 लाख गांठ तक सीमित रह सकता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतें, आयात लागत और रुपये की कमजोरी इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि, आयात अवधि आगे बढ़ने पर घरेलू बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
किसानों की मांग है कि ड्यूटी-मुक्त आयात को आगे न बढ़ाया जाए और घरेलू कपास उत्पादन को प्रोत्साहन देने वाली नीतियां अपनाई जाएं। सरकार को उद्योग की जरूरतों के साथ-साथ कपास उत्पादकों के हितों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
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