गुलाबी सुंडी के बढ़ते हमलों के बीच Bt कपास की प्रभावशीलता पर सवाल
2026-06-16 12:04:12
कपास की खेती का संकट और Bt कॉटन पर उठते सवाल
भारत के कई कपास उत्पादक क्षेत्रों में कपास की खेती लगातार कम लाभदायक होती जा रही है। इसके साथ ही आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसल Bt कॉटन को लेकर किसानों और कृषि संगठनों की चिंताएँ बढ़ी हैं। हाल ही में ऑल इंडिया किसान सभा (AIKS) ने हरियाणा के कॉटन बेल्ट में कपास उत्पादन में आई भारी गिरावट की ओर ध्यान आकर्षित किया। संगठन के अनुसार, पिंक बॉलवर्म के बढ़ते हमलों ने Bt कॉटन की फसलों को गंभीर नुकसान पहुँचाया है, जबकि इन्हें कीट-प्रतिरोधी बताकर किसानों को बेचा गया था।
आँकड़ों के अनुसार हरियाणा में कपास का रकबा पिछले कुछ वर्षों में काफी घटा है। पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में भी इसी तरह की समस्याएँ सामने आई हैं। कई किसानों का कहना है कि कीट नियंत्रण के लिए उन्हें अधिक मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ रहा है, जिससे खेती की लागत बढ़ गई है।
विभिन्न शोध अध्ययनों ने भी Bt कॉटन की दीर्घकालिक प्रभावशीलता पर प्रश्न उठाए हैं। 2020 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, कई क्षेत्रों में किसान Bt कॉटन के आगमन से पहले की तुलना में अधिक कीटनाशकों पर खर्च कर रहे हैं। 2022 में तेलंगाना में किए गए एक सर्वेक्षण में अधिकांश किसानों ने पिंक बॉलवर्म संक्रमण की शिकायत की, जिससे उत्पादन और आय दोनों प्रभावित हुए।
आलोचकों का तर्क है कि Bt कॉटन के शुरुआती लाभ समय के साथ कम हो गए हैं। उनका कहना है कि पैदावार में जो वृद्धि देखी गई, वह केवल Bt तकनीक का परिणाम नहीं थी, बल्कि बेहतर सिंचाई, अनुकूल मौसम और उन्नत हाइब्रिड बीजों का भी योगदान था। इसके अलावा, बीज बाजार पर बड़ी कंपनियों के बढ़ते नियंत्रण और गैर-Bt बीजों की घटती उपलब्धता को भी चिंता का विषय माना जा रहा है।
इन अनुभवों के आधार पर कई विशेषज्ञ कृषि पारिस्थितिकी, फसल विविधीकरण और समेकित कीट प्रबंधन जैसे टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देने की वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि किसानों की आय, पर्यावरणीय संतुलन और कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कपास उत्पादन की वर्तमान व्यवस्था पर पुनर्विचार आवश्यक है।