हरियाणा में कपास पर ‘गुलाबी संकट’: कीट प्रकोप से डरे किसान, बाजरा-ग्वार की ओर बढ़ा रुझान
हरियाणा में कपास की खेती पर इस समय “गुलाबी संकट” गहराता जा रहा है। ऊंचे बाजार भाव के बावजूद किसान कपास की बुवाई से दूरी बना रहे हैं और वैकल्पिक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं।
ढिगावा मंडी से मिली जानकारी के अनुसार, नरमा कपास का भाव फिलहाल 8 से 10 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक है, लेकिन इसके बावजूद किसानों का भरोसा इस फसल से उठता दिख रहा है। अनुमान है कि इस साल कपास का रकबा पिछले वर्ष के मुकाबले 60 से 65 प्रतिशत तक घट सकता है।
किसानों के मोहभंग की सबसे बड़ी वजह “गुलाबी सुंडी” का प्रकोप है। पिछले साल इस कीट ने कपास की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया था, जिसके चलते किसानों को समय से पहले फसल काटनी पड़ी। इसी अनुभव के कारण इस बार किसान जोखिम लेने के मूड में नहीं हैं।
स्थिति को देखते हुए कृषि विभाग ने पहले ही सतर्कता बरतते हुए कई कदम उठाए थे। अधिकारियों ने कॉटन मिलों का निरीक्षण कर बिनौले को ढककर रखने के निर्देश दिए, ताकि गुलाबी सुंडी का फैलाव रोका जा सके। साथ ही किसानों को खेतों में बचे कपास के अवशेष हटाने या नष्ट करने की सलाह दी गई, जिससे कीट का जीवनचक्र टूट सके।
इसके बावजूद असर सीमित ही रहा और किसान अब बाजरा, ग्वार व मूंग जैसी फसलों की ओर तेजी से शिफ्ट हो रहे हैं। भिवानी जिले के लोहारू और बहल क्षेत्र, जो कभी कपास उत्पादन के लिए जाने जाते थे, वहां भी फसल पैटर्न बदलता नजर आ रहा है।
किसानों के अनुसार, गिरता भूजल स्तर, न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर अनिश्चितता, और गुलाबी सुंडी व सफेद मक्खी जैसे कीटों का बढ़ता खतरा कपास से दूरी की प्रमुख वजहें हैं।
पिछले साल भिवानी जिले में लगभग 1.52 लाख एकड़ में कपास की खेती हुई थी, लेकिन इस बार अब तक बहुत कम क्षेत्र में ही बुवाई हो पाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में 8 से 10 हजार एकड़ तक और बुवाई हो सकती है।
कृषि विभाग के मुताबिक, अगले कुछ दिनों तक मौसम कपास की बुवाई के लिए अनुकूल रहने की संभावना है, क्योंकि हाल की बारिश के बाद तापमान में गिरावट आई है। हालांकि, किसानों का रुझान देखते हुए इस साल कपास उत्पादन में गिरावट तय मानी जा रही है।