ढाका और वाशिंगटन के बीच 9 फरवरी को हस्ताक्षरित नए पारस्परिक व्यापार समझौते को शुरू में बड़ी कूटनीतिक सफलता माना गया था। लेकिन अब बांग्लादेश के 47 अरब डॉलर के परिधान उद्योग में “कपास खंड” को लेकर भ्रम और चिंता बढ़ गई है। यह प्रावधान कहता है कि पारस्परिक टैरिफ में छूट तभी मिलेगी जब परिधान अमेरिकी कपास या मानव निर्मित फाइबर से बनाए जाएँ।
समझौते के तहत बांग्लादेशी परिधानों पर पहले से लागू लगभग 16.5 प्रतिशत एमएफएन शुल्क के अलावा 19 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ लगाया गया है। राहत न मिलने की स्थिति में कुल शुल्क 35.5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। सरकार का कहना है कि अमेरिकी कच्चे माल से बने कपड़ों पर 19 प्रतिशत टैरिफ हटाया जाएगा, लेकिन उद्योग जगत का तर्क है कि मूल शुल्क फिर भी लागू रहेगा।
बीजीएमईए के अध्यक्ष महमूद हसन खान ने स्पष्ट किया कि समझौते से पहले के शुल्क माफ नहीं होंगे। उनका कहना है कि रियायत मिलने पर भी निर्यातकों को 16.5 प्रतिशत शुल्क देना होगा, जिससे लागत ऊंची बनी रहेगी। साथ ही, समझौते में “निर्दिष्ट मात्रा” की सीमा तय की गई है, जो अमेरिका से आयात किए जाने वाले कच्चे माल की मात्रा पर निर्भर करेगी।
विश्लेषकों और थिंक-टैंक विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की भाषा अस्पष्ट है और कई तकनीकी पहलू साफ नहीं हैं। यदि भारत जैसे प्रतिस्पर्धी देशों को भी समान लाभ मिलता है, तो बांग्लादेश की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में सरकार के लिए जरूरी है कि वह समझौते की शर्तों को स्पष्ट करे, अन्यथा यह बहुचर्चित सौदा अपेक्षित सुरक्षा देने में विफल हो सकता है।