जलगांव में कपास की फसल पर मौसम की मार, दिवाली से पहले सीजन खत्म होने की संभावना
जलगांव, महाराष्ट्र: इस साल खरीफ सीजन की शुरुआत से ही मौसम में बदलाव और बारिश की अनिश्चितता के कारण कपास किसानों की परेशानी बढ़ी है। जून-जुलाई में हुई तेज बारिश से कुछ क्षेत्रों में कपास की बढ़वार प्रभावित हुई, जबकि जुलाई के आखिर तक मानसूनी कपास की बुआई भी प्रभावित रही। इसके बाद श्रावण महीने में पर्याप्त बारिश नहीं होने से कई इलाकों में फसलों को पानी की कमी का सामना करना पड़ा।
किसानों के अनुसार, गर्मी के कपास की फसल में रॉट और ब्लैक रॉट जैसी बीमारियों का असर देखा गया। फसल को बचाने के लिए कीटनाशक और अन्य कृषि दवाओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ा। कई किसानों ने मई में कुओं के पानी के भरोसे ड्रिप सिंचाई के माध्यम से गर्मी के कपास की बुआई की थी। हालांकि, बाद में कुओं का जलस्तर कम होने से फसल की बढ़वार प्रभावित हुई।
फसल में डोडों की संख्या कम रहने के कारण गर्मी के कपास से प्रति एकड़ करीब 3 से 4 क्विंटल उत्पादन का अनुमान जताया जा रहा है। मानसूनी कपास की फसल भी कई क्षेत्रों में प्रभावित होने की बात सामने आई है। बारिश की कमी और वापसी की बारिश नहीं होने से खेतों की नमी तथा कुओं के जलस्तर पर असर पड़ा है।
प्रति एकड़ ₹40 से ₹45 हजार तक खर्च
किसानों के अनुसार, कपास की खेती में प्रति एकड़ करीब ₹40,000 से ₹45,000 तक खर्च हो रहा है। इसमें खाद, बीज, मजदूरी, निराई-गुड़ाई, कीटनाशक, कटाई और अन्य कृषि कार्यों का खर्च शामिल है। बीमारी और फसल बचाने के लिए अतिरिक्त दवाओं के इस्तेमाल से लागत बढ़ने की भी बात कही गई है।
रबी सीजन को लेकर भी चिंता
किसानों के अनुसार, इस बार कुछ क्षेत्रों में कपास का सीजन सामान्य अवधि से पहले, यानी दिवाली से पहले समाप्त होने की संभावना है। हालांकि, यह स्थिति क्षेत्र और फसल की अवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
बारिश और सिंचाई के पानी की कमी के कारण किसानों को रबी सीजन के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी और पानी उपलब्ध रहने को लेकर भी चिंता है। आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति, कुओं का जलस्तर और फसल की वास्तविक उपज से स्थिति और स्पष्ट होगी।