बिना मंज़ूरी वाला HTBt कॉटन भारत में क्यों फैल रहा है?
भारत में बिना मंज़ूरी वाले हर्बिसाइड-टॉलरेंट Bt (HTBt) कॉटन की खेती तेजी से बढ़ रही है। साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर (SABC) की एक स्टडी के मुताबिक, खरीफ सीजन 2025-26 में देश के 24-30% कॉटन रकबे, यानी करीब 65-72 लाख एकड़ में इसकी खेती होने का अनुमान है। इसकी प्रमुख वजह खरपतवार नियंत्रण की बढ़ती लागत, मजदूरों की कमी और मौजूदा Bt कॉटन की कीटों के खिलाफ घटती प्रभावशीलता है।
Bt कॉटन और HTBt कॉटन में क्या अंतर है?
भारत में 2002 में व्यावसायिक खेती के लिए Bt कॉटन को मंजूरी मिली थी। इसमें Bacillus thuringiensis नामक बैक्टीरिया से प्राप्त प्रोटीन होते हैं, जो बॉलवर्म जैसे खास कीटों से फसल की रक्षा करते हैं। इसके इस्तेमाल से शुरुआती वर्षों में कपास की पैदावार बढ़ाने और कीटनाशकों का उपयोग घटाने में मदद मिली।
HTBt कॉटन में कीट-प्रतिरोध के साथ हर्बिसाइड सहन करने का अतिरिक्त गुण भी होता है। इससे किसान फसल को नुकसान पहुंचाए बिना ग्लाइफोसेट जैसे खरपतवारनाशक का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, भारत में HTBt कॉटन को व्यावसायिक खेती की मंजूरी नहीं मिली है।
किसान इसे क्यों अपना रहे हैं?
SABC की स्टडी के अनुसार, हाथ से निराई करने की लागत प्रति एकड़ ₹12,000-15,000 तक हो सकती है, जबकि ग्लाइफोसेट आधारित खरपतवार नियंत्रण का अनुमानित खर्च ₹750-850 है। हालांकि, ये आंकड़े क्षेत्र और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं।
दूसरी ओर, मौजूदा Bollgard-II Bt कॉटन में इस्तेमाल होने वाले Cry1Ac और Cry2Ab प्रोटीन के खिलाफ पिंक बॉलवर्म में प्रतिरोध विकसित होने से इसकी प्रभावशीलता घट रही है। इससे किसानों में वैकल्पिक तकनीकों की मांग बढ़ी है।
कॉटन उत्पादन में गिरावट की वजह
भारत का कपास उत्पादन 2013-14 में लगभग 39.8 मिलियन गांठ के शिखर पर था, जबकि 2025-26 के शुरुआती सरकारी आंकड़ों में यह घटकर 29.1 मिलियन गांठ रह गया। पिंक बॉलवर्म का बढ़ता प्रतिरोध, मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां, फसल की बीमारियां और कपास के रकबे में कमी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
क्या हैं चिंताएं?
बिना मंजूरी वाले HTBt बीजों का अनौपचारिक बाजार के जरिए प्रसार नियामकीय निगरानी और बीजों की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े करता है। किसानों को बीजों की वास्तविक आनुवंशिक संरचना की जानकारी न होने और फसल खराब होने की स्थिति में सीमित विकल्प मिलने का जोखिम भी है।
इस तरह, HTBt कॉटन का बढ़ता चलन सस्ती खरपतवार नियंत्रण तकनीक की किसानों की जरूरत और मंजूर कृषि तकनीकों की सीमाओं को उजागर करता है। चुनौती यह है कि किसानों को प्रभावी और किफायती विकल्प उपलब्ध कराए जाएं, साथ ही बीजों की गुणवत्ता, पर्यावरणीय प्रभाव और जैव-सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
रेजिस्टेंस को दूर करने के लिए रिसर्च चल रही है। जुलाई 2026 में, इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट ने पिंक बॉलवर्म रेजिस्टेंस से निपटने के लिए एक नए टॉक्सिन वाले कॉटन हाइब्रिड को डेवलप करने के लिए रासी सीड्स के साथ पार्टनरशिप की घोषणा की। इंस्टीट्यूट ने कहा कि कमर्शियल बीज 2030 के आसपास उपलब्ध हो सकते हैं, जो आगे के डेवलपमेंट पर निर्भर करेगा।
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