पंजाब की कॉटन इंडस्ट्री कच्चे माल की कमी से संकट में, उत्पादन में भारी गिरावट
पंजाब की कपास आधारित इंडस्ट्री इस समय गंभीर कच्चे माल के संकट से गुजर रही है। कभी देश के प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में शामिल पंजाब में अब स्थानीय उत्पादन घटने के कारण उद्योगों को महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
एक समय राज्य में 7 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती थी, जो अब घटकर लगभग 1.2 लाख हेक्टेयर रह गई है। 2019 में यह रकबा 3.35 लाख हेक्टेयर था। विशेषज्ञों के अनुसार, कपास की खेती में गिरावट का मुख्य कारण कीट प्रकोप, कम पैदावार और किसानों का अन्य फसलों की ओर बढ़ता रुझान है।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि पंजाब में उन्नत और रोग-प्रतिरोधी बीजों की कमी भी उत्पादन घटने का बड़ा कारण है। इसके विपरीत महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आधुनिक बीजों की मदद से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा रहा है।
आंकड़ों के अनुसार, इस सीजन में महाराष्ट्र में लगभग 1.15 करोड़ गांठ कपास का उत्पादन हुआ, जबकि पंजाब में यह केवल 1.5 लाख गांठ तक सीमित रहा। इसी कारण राज्य की जिनिंग और स्पिनिंग इकाइयों को कच्चा माल बाहर से मंगवाना पड़ रहा है।
कपास की कमी का सीधा असर उद्योग पर पड़ा है। जहां पहले पंजाब में 422 जिनिंग इकाइयां थीं, अब उनकी संख्या घटकर मात्र 25 रह गई है। कई इकाइयां बंद हो चुकी हैं और कुछ उद्योग अन्य राज्यों में स्थानांतरित हो गए हैं।
स्थिति सुधारने के लिए राज्य सरकार ने प्रमाणित कपास बीजों पर 33% सब्सिडी देने की घोषणा की है और 2026 तक रकबा बढ़ाकर 1.25 लाख हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा है। सरकार किसानों से धान की बजाय कपास अपनाने की अपील भी कर रही है।