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कपास उत्पादकता मिशन: सही क्रियान्वयन, बेहतर परिणाम

2026-05-11 16:50:33
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कपास उत्पादकता मिशन: सफलता की कुंजी प्रभावी क्रियान्वयन में

भारत का 5,659 करोड़ रुपये का कपास उत्पादकता मिशन ऐसे समय में शुरू किया गया है जब देश की कपास अर्थव्यवस्था गंभीर कृषि और औद्योगिक चुनौतियों से जूझ रही है। लगातार घटती पैदावार, बढ़ते कीट प्रकोप और सिकुड़ते रकबे ने उस फसल को कमजोर कर दिया है जो कभी ग्रामीण आय और भारत के वस्त्र उद्योग की रीढ़ मानी जाती थी। ऐसे में केंद्र की यह पहल केवल उत्पादन बढ़ाने की योजना नहीं, बल्कि उन किसानों का भरोसा लौटाने का प्रयास भी है जिन्होंने धीरे-धीरे कपास की खेती से दूरी बना ली है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों के लिए यह मिशन विशेष महत्व रखता है।

पंजाब के मालवा क्षेत्र में कपास कभी एक विश्वसनीय नकदी फसल हुआ करती थी। लेकिन सफेद मक्खी और गुलाबी बॉलवर्म के बार-बार हमले, मौसम की अनिश्चितता और खेती की बढ़ती लागत ने किसानों को फिर से धान की ओर मोड़ दिया, जबकि धान की खेती पहले से ही भूजल संकट को और गहरा कर रही है। उत्तर भारत में कपास के घटते रकबे से यह साफ झलकता है कि किसान आज पर्यावरणीय अस्थिरता और आर्थिक असुरक्षा के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

मिशन में जलवायु-अनुकूल बीज किस्मों, उच्च घनत्व रोपण तकनीकों, आधुनिक जिनिंग ढांचे और अतिरिक्त लंबे रेशे वाले कपास पर दिया गया जोर निश्चित रूप से सकारात्मक कदम है। भारत यदि वैश्विक कपड़ा उद्योग में अग्रणी बनना चाहता है, तो उसे प्रीमियम गुणवत्ता वाले आयातित कपास पर निर्भरता कम करनी होगी। ‘खेत से फाइबर, फैशन और विदेशी बाजार तक’ की व्यापक रणनीति इस तथ्य को स्वीकार करती है कि कृषि और विनिर्माण एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

हालांकि, इस मिशन की वास्तविक सफलता इसकी जमीनी स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन क्षमता पर निर्भर करेगी। किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज, सस्ता ऋण, वैज्ञानिक कीट प्रबंधन और ऐसी फसल बीमा व्यवस्था चाहिए जो कागजी औपचारिकताओं में उलझने के बजाय वास्तविक सुरक्षा दे सके। यदि किसानों को फिर से कपास की खेती की ओर आकर्षित करना है, तो खरीद व्यवस्था में भरोसा बहाल करना भी उतना ही जरूरी होगा।

पंजाब और हरियाणा जैसे जल संकट से जूझ रहे राज्यों में कपास की वापसी धान पर निर्भरता कम करने और भूजल संरक्षण में मददगार साबित हो सकती है। लेकिन यदि यह मिशन भी कागजी योजनाओं और धीमे समन्वय तक सीमित रह गया, तो देश एक बार फिर उसी निराशा के चक्र में फंस जाएगा जिसने किसानों को कपास की खेती छोड़ने पर मजबूर किया था।


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