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कुरनूल में कपास की चमक फीकी

2024-06-27 18:39:01
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कुरनूल में कपास की गिरती चमक: ‘सबसे मुनाफ़े वाली फसल’ का दर्जा खोया


आंध्र प्रदेश: अविभाजित कुरनूल जिले में कभी ‘सफेद सोना’ कही जाने वाली कपास अब अपनी चमक खोती नजर आ रही है। हाल के वर्षों में कपास की खेती में तेज गिरावट दर्ज की गई है, जिससे किसानों और कृषि वैज्ञानिकों के बीच चिंता बढ़ गई है।

एक समय राज्य के कुल कपास उत्पादन में करीब 70% हिस्सेदारी रखने वाला यह क्षेत्र अब उत्पादन और रकबे दोनों में गिरावट का सामना कर रहा है। 1990 के दशक में मल्लिका, बनी, ब्रह्मा और NHH-44 जैसे हाइब्रिड्स के कारण प्रति एकड़ 10 से 25 क्विंटल तक उपज मिलती थी, जबकि 2000 के दशक की शुरुआत में बीटी कपास से उम्मीदें जगी थीं।

हालांकि, अब हालात बदल चुके हैं। जिले के पुनर्गठन के बाद कपास का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित क्षेत्रों में चला गया, जिससे खेती का रकबा घट गया। कुरनूल में कपास का क्षेत्र 2.50 लाख हेक्टेयर से घटकर 2023-24 में 1.83 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि नंदयाल में 70% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई।

कपास की गिरती लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं—अनियमित मानसून, जलवायु परिवर्तन, समय से पहले बारिश की वापसी और अक्टूबर-नवंबर में चक्रवातों की बढ़ती घटनाएं। इसके अलावा, गुलाबी बॉलवर्म जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ा है, जिसने बीटी कपास की प्रभावशीलता को भी चुनौती दी है। तंबाकू स्ट्रीक वायरस ने भी किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं।

इन परिस्थितियों के चलते किसान अब कपास की जगह मक्का और सोयाबीन जैसी कम अवधि और अधिक लाभदायक फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। खासकर नंदयाल में, जहां सिंचाई की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं, यह बदलाव अधिक स्पष्ट है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति को संभालने के लिए कम अवधि वाली बीटी किस्मों को अपनाना, फसल-मुक्त अवधि का सख्ती से पालन करना और कीट नियंत्रण के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना जरूरी होगा।


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Team Sis
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