कॉटन की कीमतों में उतार-चढ़ाव से टेक्सटाइल उद्योग चिंतित
कॉटन और यार्न की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव के बीच तमिलनाडु की टेक्सटाइल मिलें और गारमेंट यूनिट्स कॉटन की उपलब्धता बेहतर करने के उपाय चाहती हैं।
कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि दुनियाभर में कॉटन यार्न की मांग में तेजी इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रमुख कारणों में से एक है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यार्न की मांग पिछले कुछ वर्षों की तुलना में बेहतर हुई है। 2023-24 से कॉटन यार्न की मांग कमजोर थी, लेकिन पिछले दिसंबर से टेक्सटाइल वैल्यू चेन में टेक्सटाइल उत्पादों की मांग बढ़ने लगी।
चीन और बांग्लादेश से यार्न की मांग बढ़ी है, जबकि घरेलू गारमेंट बाजार में भी मांग में सुधार हो रहा है। इससे यार्न का बाजार बेहतर हुआ है। होजरी यार्न का निर्यात मुख्य रूप से गुजरात की मिलों से होता है, जबकि तमिलनाडु की मिलों की इसमें हिस्सेदारी कम है।
कॉटन फ्यूचर्स की कीमत एक समय 92 सेंट प्रति पाउंड तक पहुंच गई थी, जो अब करीब 86 सेंट है। चंद्रन के अनुसार, पिछले एक साल में साफ कॉटन की लैंडेड कीमत करीब ₹70 बढ़ी है, जबकि यार्न की कीमत में लगभग ₹95 प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई है।
इस बीच, तिरुप्पुर एक्सपोर्टर्स एंड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने केंद्र और राज्य सरकारों से कॉटन के निर्यात पर रोक लगाने की अपील की है। एसोसिएशन ने आरोप लगाया कि जनवरी से कुछ बड़ी स्पिनिंग मिलों और कारोबारियों ने कॉटन की सप्लाई कृत्रिम रूप से सीमित की है, जिससे यार्न की कीमतें बढ़ी हैं और छोटे व मध्यम उद्यमों पर दबाव बढ़ा है।
एसोसिएशन के मुताबिक, देश में कॉटन की जरूरत करीब 350 लाख बेल है, जबकि घरेलू उत्पादन लगभग 290 लाख बेल है। सरकार ने कॉटन पर 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाई और करीब 62 लाख बेल कॉटन का आयात किया। इसके बावजूद कीमतों में बढ़ोतरी जारी है। एसोसिएशन ने इसे कृत्रिम बाजार हेरफेर का नतीजा बताया है और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।
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