हैदराबाद: तेलंगाना में किसानों ने ‘सफेद सोना’ कही जाने वाली कपास की खेती के लिए तैयारियां तेज कर दी हैं। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जून का महीना कपास की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है, जबकि अक्टूबर-नवंबर तक फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। अच्छी बारिश, उन्नत बीज और सही कृषि तकनीक अपनाकर किसान बेहतर उत्पादन और मुनाफा हासिल कर सकते हैं।
तेलंगाना में कपास प्रमुख नकदी फसलों में शामिल है और हजारों किसान इसकी खेती पर निर्भर हैं। खरीफ सीजन की यह फसल मानसून की पहली बारिश के साथ जून में बोई जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मुख्य बुवाई का समय जून से जुलाई के पहले सप्ताह तक रहता है, लेकिन इसकी तैयारी अप्रैल और मई में ही शुरू हो जाती है। इस दौरान किसान खेतों की गहरी जुताई करते हैं ताकि मिट्टी की नमी और जलधारण क्षमता बेहतर बनी रहे तथा कीटों का प्रभाव कम हो सके।
कृषि वैज्ञानिक किसानों को समय पर खेत तैयार करने, संतुलित उर्वरक उपयोग करने और गुणवत्तापूर्ण बीज चुनने की सलाह दे रहे हैं। साथ ही, सिंचाई और कीट नियंत्रण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई जा रही है ताकि फसल को शुरुआती चरण में नुकसान से बचाया जा सके।
कपास की फसल आमतौर पर 150 से 180 दिनों में तैयार हो जाती है। जून में बुवाई के बाद उचित देखभाल, खाद और पानी की व्यवस्था से अक्टूबर-नवंबर तक खेत सफेद रुई से भर जाते हैं। इसी समय फसल की पहली तुड़ाई शुरू होती है, जो किसानों के लिए आय का प्रमुख स्रोत बनती है।
कपास को तेलंगाना की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यह न केवल किसानों की आय का बड़ा साधन है, बल्कि राज्य में कृषि आधारित उद्योगों को भी मजबूती देता है। अच्छी पैदावार की स्थिति में यह फसल ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक समृद्धि और रोजगार के अवसर भी बढ़ाती है।