भारत का 'सफेद सोना': खेत से कपड़े तक खुशहाली का ताना-बाना
भारत के कपास के खेतों से लेकर दुनिया भर के लोगों के कपड़ों तक, कपास खेती, उद्योग, व्यापार और आजीविका को आपस में जोड़ता है। अक्सर 'सफेद सोना' (White Gold) कहे जाने वाले कपास को भारत की सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक फसलों में से एक माना जाता है। यह लगभग 60 लाख किसानों की मदद करता है और प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और व्यापार के क्षेत्रों में 4 से 5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। भारत दुनिया के कुल कपास फाइबर उत्पादन का लगभग 23% हिस्सा पैदा करता है, जिससे कपास देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और निर्यात क्षेत्र का एक अहम आधार बन गया है।
भारत का कपास से नाता हजारों साल पुराना है, जब इसके कपड़ों की एशिया और यूरोप में बहुत मांग थी। स्वदेशी आंदोलन के दौरान, कपास आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया था, और आज भी यह 'आत्मनिर्भर भारत' के विजन के तहत उस विरासत को आगे बढ़ा रहा है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कपास की चारों मान्यता प्राप्त प्रजातियों की खेती होती है। कपास की खेती के रकबे (क्षेत्रफल) के मामले में यह दुनिया में पहले स्थान पर है और उत्पादन व खपत के मामले में दूसरे स्थान पर है; 2025-26 में यहाँ लगभग 291 लाख गांठों (bales) का उत्पादन हुआ।
कपास की खेती मुख्य रूप से ग्यारह राज्यों में होती है, जिसमें से लगभग 62% खेती बारिश पर निर्भर (rain-fed) होती है। फाइबर के अलावा, कपास के बीज से खाने का तेल, पशुओं का चारा, बायोमास ईंधन और सर्जिकल कॉटन मिलता है, जिससे यह फसल टेक्सटाइल उद्योग के अलावा भी बहुत मूल्यवान बन जाती है।
सरकार ने इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई तरह की रणनीतियां अपनाई हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से किसानों को अच्छी कमाई सुनिश्चित होती है, जबकि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (CCI) तब कपास की खरीद करता है जब बाजार भाव MSP से नीचे गिर जाते हैं। 2025-26 सीजन के दौरान, CCI ने ₹41,530 करोड़ मूल्य की 105 लाख से अधिक गांठों की खरीद की, जिससे लाखों किसानों को फायदा हुआ।
उत्पादकता बढ़ाने के लिए, 'मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी' का लक्ष्य जलवायु-अनुकूल, कीट-प्रतिरोधी और अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित करना है, जिसमें 'एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल' (ELS) कपास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही, 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन' के तहत बेहतर बुवाई तकनीकों के प्रदर्शन से पैदावार में काफी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
'कपास किसान ऐप' जैसी डिजिटल पहलों ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, स्लॉट बुकिंग और आधार-लिंक्ड भुगतान की सुविधा देकर MSP खरीद को पारदर्शी और किसान-अनुकूल बना दिया है। वहीं, 'कस्तूरी कॉटन भारत' सर्टिफिकेशन, ब्लॉकचेन-आधारित ट्रेसेबिलिटी और गुणवत्ता आश्वासन के जरिए भारतीय कपास को एक प्रीमियम ग्लोबल ब्रांड के तौर पर स्थापित कर रहा है। भारत ग्लोबल कॉटन ट्रेड में भी एक अहम भूमिका निभाता है और अमेरिका, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे बड़े बाज़ारों में फ़ाइबर, यार्न, फ़ैब्रिक और कपड़े एक्सपोर्ट करता है।
इतिहास से जुड़े होने के बावजूद इनोवेशन से आगे बढ़ रहा भारत का कॉटन सेक्टर, बेहतर टेक्नोलॉजी, मज़बूत पॉलिसी सपोर्ट और बाज़ार तक बेहतर पहुँच के ज़रिए लगातार तरक्की कर रहा है। खेत से लेकर फ़ैब्रिक तक, कॉटन लाखों लोगों की आजीविका को जोड़ने वाला एक अहम ज़रिया बना हुआ है, साथ ही यह भारत की एग्रीकल्चरल इकॉनमी और ग्लोबल टेक्सटाइल लीडरशिप को भी मज़बूत करता है।
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