क्या नई टेक्नोलॉजी के बिना सफल हो पाएगा भारत का कॉटन मिशन?
भारत का कॉटन सेक्टर एक बार फिर बदलाव के मोड़ पर खड़ा है। 2002 में शुरू हुए टेक्नोलॉजी मिशन ऑन कॉटन (TMC) ने Bt कॉटन जैसी नई तकनीक के जरिए देश में कॉटन उत्पादन और निर्यात को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। 2002 से 2015 के बीच कॉटन उत्पादकता करीब 300 किलोग्राम लिंट प्रति हेक्टेयर से बढ़कर 500 किलोग्राम से अधिक हो गई। भारत दुनिया का सबसे बड़ा कॉटन उत्पादक और निर्यातक बनकर उभरा।
लेकिन 2015 के बाद नई तकनीकों की कमी, बढ़ती लागत और पिंक बॉलवर्म जैसी समस्याओं के कारण कॉटन सेक्टर की रफ्तार धीमी पड़ गई। उत्पादन 390 लाख गांठ के रिकॉर्ड स्तर से घटकर लगभग 290 लाख गांठ तक पहुंच गया। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित हुई, बल्कि टेक्सटाइल उद्योग को भी कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ा।
सरकार ने अब ₹5,659 करोड़ के कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन (MCP) की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य 2031 तक उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पारंपरिक उपायों से यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा।
मिशन में हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS), बेहतर बीज और उन्नत खेती तकनीकों पर जोर दिया गया है, लेकिन असली चुनौती नई जेनेटिक टेक्नोलॉजी और मशीनीकरण की कमी है। किसान तेजी से हर्बिसाइड-टॉलरेंट Bt कॉटन जैसी तकनीकों की मांग कर रहे हैं, जबकि रेगुलेटरी मंजूरी में लगातार देरी हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को AI आधारित पेस्ट मॉनिटरिंग, IoT खेती, रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर और नई जेनेटिक टेक्नोलॉजी को अपनाना होगा। बिना तकनीकी नवाचार के केवल नीतियों और पारंपरिक तरीकों से कॉटन उत्पादन में बड़ी वृद्धि संभव नहीं दिखती। यदि भारत को वैश्विक कॉटन बाजार में अपनी मजबूत स्थिति फिर से हासिल करनी है, तो विज्ञान और तकनीक आधारित व्यापक सुधार जरूरी होंगे।