कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग तेज, टेक्सटाइल मंत्रालय कर रहा अध्ययन
कोयंबटूर/नई दिल्ली: देश की टेक्सटाइल और अपैरल इंडस्ट्री ने कच्चे कॉटन पर लगने वाली 11% इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। उद्योग संगठनों का कहना है कि घरेलू बाजार में कॉटन की सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतों के कारण स्पिनिंग मिलों तथा डाउनस्ट्रीम टेक्सटाइल कंपनियों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में आयात शुल्क हटाना उद्योग के लिए जरूरी हो गया है।
हाल ही में मुंबई में आयोजित कॉटन प्रोडक्शन एंड कंजम्पशन कमिटी की बैठक में उपभोक्ता उद्योग के प्रतिनिधियों ने यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया। इसके बाद टेक्सटाइल कमिश्नर कार्यालय ने केंद्रीय टेक्सटाइल मंत्रालय को सिफारिश भेजी है कि अगले पांच वर्षों तक हर साल अप्रैल से सितंबर के बीच कॉटन इंपोर्ट पर लगने वाली ड्यूटी को अस्थायी रूप से निलंबित किया जाए। फिलहाल यह प्रस्ताव मंत्रालय के विचाराधीन है और सरकार इसके आर्थिक व व्यापारिक प्रभावों का अध्ययन कर रही है।
कोयंबटूर में आयोजित स्टेकहोल्डर्स मीटिंग के दौरान उद्योग संगठनों ने कहा कि ड्यूटी हटने से भारतीय मिलों को वैश्विक बाजार के बराबर प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलेगा। उनका मानना है कि इससे घरेलू उद्योग को बेहतर गुणवत्ता वाला कच्चा माल उचित कीमत पर उपलब्ध हो सकेगा और कॉटन की कमी से पैदा दबाव कम होगा।
उद्योग संगठनों के अनुसार, वर्ष 2025-26 में टेक्सटाइल इंडस्ट्री की कॉटन आवश्यकता लगभग 337 लाख बेल रहने का अनुमान है, जबकि उपलब्धता करीब 292.15 लाख बेल रहने की संभावना है। इससे लगभग 45 लाख बेल की कमी पैदा हो सकती है। संगठनों का दावा है कि यदि समय रहते आयात आसान नहीं किया गया तो इसका असर पूरी कॉटन वैल्यू चेन पर पड़ेगा, जिससे सीधे जुड़े करीब 3.5 करोड़ लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
इस बीच, अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) के चेयरमैन ए. शक्तिवेल के नेतृत्व में उद्योग प्रतिनिधिमंडल ने उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और टेक्सटाइल मंत्री गिरिराज सिंह से मुलाकात कर ड्यूटी हटाने की मांग दोहराई। तमिलनाडु सरकार ने भी केंद्र से कॉटन इंपोर्ट ड्यूटी समाप्त करने और राज्य में CCI वेयरहाउस स्थापित करने की मांग की है।