कपास 9,000 के करीब, फिर भी किसान और व्यापारी संकट में
By yash chouhan 2026-04-06 11:41:31
कपास की कीमतें 9,000 रुपये के करीब पहुँच रही हैं, लेकिन किसान अब भी संकट में हैं और व्यापारी भी दबाव में दिखाई दे रहे हैं।
जलगांव में पिछले कुछ हफ्तों से कपास के दाम लगातार बढ़ते हुए 8,500 से 9,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुँच गए हैं। कुछ जगहों पर अच्छी गुणवत्ता वाले कपास के लिए इससे भी ज्यादा कीमत मिल रही है। पहली नजर में यह किसानों के लिए राहत की खबर लगती है, क्योंकि दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग और चिंताजनक है।
सीजन की शुरुआत में बड़ी मात्रा में कपास बाजार में आ गई थी, जिससे उस समय कीमतें 7,000 से 7,500 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहीं। अब बाजार में स्टॉक कम हो गया है, जबकि मिलों और व्यापारियों की मांग लगातार बनी हुई है। इस मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
व्यापारियों के बीच खरीद की होड़ बढ़ गई है और कई जगहों पर नीलामी में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मौजूद परिस्थितियां, उत्पादन में कमी, निर्यात मांग और यार्न उद्योग की बढ़ती जरूरतें—ये सभी कारक आगे भी कीमतों को ऊपर ले जा सकते हैं।
लेकिन असली सवाल यह है कि इस बढ़ती कीमत का फायदा किसानों को कितना मिल रहा है। हकीकत यह है कि अधिकांश किसानों ने अपनी फसल पहले ही कम दाम पर बेच दी थी। वित्तीय दबाव, कर्ज चुकाने की मजबूरी, घरेलू खर्च और भंडारण की कमी के कारण वे अपनी उपज लंबे समय तक रोक नहीं पाए।
अब जब कीमतें बढ़ गई हैं, तो किसानों के पास बेचने के लिए कपास बचा ही नहीं है। ऐसे में इस तेजी का सीधा लाभ व्यापारियों, बिचौलियों और स्टॉकिस्टों को मिल रहा है, जिन्होंने पहले से कपास का भंडारण कर रखा था और अब ऊंचे दाम पर बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।
यह स्थिति कृषि व्यवस्था की बुनियादी खामियों को उजागर करती है। एक ओर बाजार में तेजी है, तो दूसरी ओर किसान उससे वंचित रह जाते हैं। मेहनत करने वाला किसान घाटे में रहता है, जबकि मुनाफा बाजार के बीच के खिलाड़ियों तक सीमित हो जाता है।
इस समस्या के समाधान के लिए किसानों को बेहतर भंडारण सुविधाएं उपलब्ध कराना बेहद जरूरी है। गांवों में आधुनिक गोदाम और कोल्ड स्टोरेज विकसित किए जाने चाहिए, ताकि किसान अपनी उपज को सही समय तक सुरक्षित रख सकें।
इसके साथ ही, किसानों को कम ब्याज दर पर आसानी से ऋण उपलब्ध होना चाहिए, जिससे उन्हें तुरंत फसल बेचने की मजबूरी न रहे। बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने, ई-एनएएम जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत करने और किसान उत्पादक कंपनियों को सशक्त बनाने की भी जरूरत है। इससे किसान सीधे बाजार से जुड़कर अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकते हैं।