कपास शुल्क कटौती पर व्यापार विभाजन; किसानों के लिए जोखिम चिह्नित, सीसीआई
कपास आयात शुल्क में कटौती को लेकर मतभेद गहराते दिख रहे हैं। जहां एक ओर मिलर्स और कपड़ा उद्योग बढ़ती घरेलू कीमतों के चलते शुल्क घटाने की मांग कर रहे हैं, वहीं व्यापार जगत के एक वर्ग ने इसे किसानों के लिए जोखिम भरा कदम बताया है।
भारत में कपास पर वर्तमान में लगभग 11% आयात शुल्क लागू है, जो 1 जनवरी 2026 से प्रभावी हुआ। हालांकि कीमतों में तेज़ उछाल के कारण सरकार और उद्योग इस शुल्क में कमी पर विचार कर रहे हैं, लेकिन कई व्यापारी इसके खिलाफ हैं। उनका मानना है कि अभी शुल्क घटाने से किसानों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
व्यापारियों के अनुसार, कई किसान बेहतर कीमतों की उम्मीद में अपनी उपज को रोके हुए हैं, जिसकी मात्रा लगभग 40 लाख गांठ आंकी जा रही है (एक गांठ = 170 किलोग्राम)। ऐसे में यदि आयात सस्ता हो जाता है, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव पड़ेगा और किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
एक वरिष्ठ व्यापारी ने चेतावनी दी कि पिछली बार जब आयात शुल्क में कटौती की गई थी, तब केवल तीन महीनों में करीब 30 लाख गांठ कपास का आयात हुआ था। इससे घरेलू मांग आयात से पूरी होने लगी और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा स्थिति में भी शुल्क घटाया गया, तो इसी तरह की परिस्थितियां दोबारा उत्पन्न हो सकती हैं—खासतौर पर उन किसानों के लिए जिन्होंने बेहतर दाम की उम्मीद में अपनी उपज रोक रखी है।