महाराष्ट्र: कम बारिश के बीच शुरू हुई कपास की बुवाई, अहिल्यानगर में रकबा घटने की आशंका
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले में मॉनसून की शुरुआत हुए लगभग एक महीना बीत चुका है, लेकिन अब तक सामान्य और व्यापक बारिश नहीं होने से खरीफ सीजन की बुवाई प्रभावित हो रही है। हालांकि पिछले दो दिनों में हुई हल्की बारिश के बाद कुछ किसानों ने सिंचाई सुविधाओं के भरोसे कपास की बुवाई शुरू कर दी है। कृषि विभाग का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो इस वर्ष जिले में कपास का कुल रकबा घट सकता है।
जिले के शेवगांव, पाथर्डी, राहुरी और नेवासा जैसे तालुकों में सीमित स्तर पर कपास की बुवाई शुरू हो चुकी है। लेकिन अधिकांश किसान अभी भी पर्याप्त वर्षा का इंतजार कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि कम नमी वाली जमीन में बुवाई करने पर बीज खराब होने और दोबारा बुवाई की नौबत आने का खतरा रहता है। चूंकि कपास के बीज महंगे हैं, इसलिए दोबारा बुवाई किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकती है।
पिछले कुछ वर्षों में अहिल्यानगर जिले में कपास की खेती का रकबा लगातार बढ़ा है। पहले जहां जिले में कपास सीमित क्षेत्र में बोई जाती थी, वहीं अब गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के किसान भी कपास की खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। वर्तमान में अहिल्यानगर, शेवगांव, पाथर्डी, नेवासा, जामखेड़, कर्जत और कोपरगांव सहित कई क्षेत्रों में कपास की खेती की जा रही है। पिछले तीन वर्षों में जिले में कपास का औसत रकबा 1,22,086 हेक्टेयर दर्ज किया गया है, जबकि पिछले वर्ष लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती हुई थी।
अब तक राहुरी तालुका में सबसे अधिक 5,045 हेक्टेयर में कपास की बुवाई दर्ज की गई है। इसके बाद नेवासा में 1,551 हेक्टेयर, श्रीगोंडा में 571 हेक्टेयर, कर्जत में 318 हेक्टेयर, शेवगांव में 300 हेक्टेयर तथा श्रीरामपुर में 238 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई की गई है।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्यतः मृग नक्षत्र के दौरान अच्छी बारिश होने पर कपास की बुवाई रफ्तार पकड़ती है, लेकिन इस वर्ष मानसून की धीमी प्रगति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले दो वर्षों में अत्यधिक बारिश से फसल को नुकसान और बाजार में उचित दाम नहीं मिलने के कारण किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। ऐसे में इस वर्ष किसानों को समय पर अच्छी बारिश और कपास के बेहतर बाजार भाव, दोनों का इंतजार है। यदि जल्द पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो जिले में कपास की खेती का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम रह सकता है।