हमने खाड़ी क्षेत्र में चल रहे युद्ध और आने वाले मॉनसून पर एल नीनो के संभावित प्रभाव का अध्ययन किया है, ताकि यह समझा जा सके कि इन परिस्थितियों का देश, खासकर महाराष्ट्र, में कॉटन की खेती पर क्या असर पड़ेगा और किसानों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल संघर्ष को एक महीना हो चुका है। इस युद्ध को लेकर कई अनिश्चितताएँ हैं—यह कब तक चलेगा, क्या इसका दायरा और बढ़ेगा, और क्या यह किसी बड़े वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। भले ही युद्ध में अस्थायी विराम आए, लेकिन स्थिति सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है।
इन अंतरराष्ट्रीय हालातों को देखते हुए, भारत में—विशेषकर महाराष्ट्र जैसे प्रमुख राज्यों में—कॉटन किसानों, खेत मजदूरों और इससे जुड़े उद्योगों के भविष्य का आकलन करना जरूरी हो जाता है।
भारत में लगभग 16% कृषि क्षेत्र में कॉटन की खेती होती है, जिसकी बुवाई अप्रैल से शुरू होती है। देश के करीब 75% कॉटन क्षेत्र मध्य भारत—महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक—में स्थित है, जहाँ जून में मॉनसून के साथ इसकी खेती होती है। अकेले महाराष्ट्र में लगभग 33% कॉटन क्षेत्र है, जिससे लाखों किसानों की आजीविका जुड़ी है।
इस सीज़न में कॉटन की खेती के लिए तीन मुख्य कारक महत्वपूर्ण रहेंगे:
1. मॉनसून और वर्षा की स्थिति
वर्तमान में प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति बन रही है। अनुमान है कि जून से अगस्त के बीच इसका प्रभाव बढ़ेगा, जिससे मॉनसून सामान्य से कमजोर या औसत से कम रह सकता है। इसका सीधा असर कॉटन उत्पादन पर पड़ सकता है।
2. फर्टिलाइज़र की उपलब्धता
खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण भारत की इंपोर्ट सप्लाई प्रभावित हो सकती है। भारत की लगभग 85% फर्टिलाइज़र और 20% क्रूड ऑयल सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती है। यदि यहाँ व्यवधान आता है, तो यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों की कमी हो सकती है, जिससे खेती की लागत और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।
3. क्रूड ऑयल और टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर असर
क्रूड ऑयल की आपूर्ति प्रभावित होने से सिंथेटिक फाइबर (जैसे पॉलिएस्टर और नायलॉन) की लागत बढ़ सकती है। इससे प्राकृतिक फाइबर—जैसे कॉटन—की मांग बढ़ने की संभावना है। भारत में पहले से ही प्राकृतिक टेक्सटाइल की खपत अधिक है, और यह रुझान आगे और मजबूत हो सकता है।